कविता

*अपना गाँव*

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अपने गाँव पर लिखी एक पुरानी छोटी सी कविता याद आ गयी आपके समक्ष रख रहा हूँ

वो कोठरी
का काला कोना
चूल्हे से उठता धुँआ
जलती लकडियोँ के बीच
सिकती रोटियाँ
उन रोटियोँ की मिठास
और
वो अपनापन
भूल गये या याद है?
खेतोँ मेँ लहराती
सरसो,
नदियोँ का जल
बहता बरसोँ,
सर सराती वो हवा,
कलकल करती नदियाँ,
और वो बाग सुंदर
भूल गये या याद है?

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सौरभ कुमार दुबे

सह सम्पादक- जय विजय!!! मैं, स्वयं का परिचय कैसे दूँ? संसार में स्वयं को जान लेना ही जीवन की सबसे बड़ी क्रांति है, किन्तु भौतिक जगत में मुझे सौरभ कुमार दुबे के नाम से जाना जाता है, कवितायें लिखता हूँ, बचपन की खट्टी मीठी यादों के साथ शब्दों का सफ़र शुरू हुआ जो अबतक निरंतर जारी है, भावना के आँचल में संवेदना की ठंडी हवाओं के बीच शब्दों के पंखों को समेटे से कविता के घोसले में रहना मेरे लिए स्वार्गिक आनंद है, जय विजय पत्रिका वह घरौंदा है जिसने मुझ जैसे चूजे को एक आयाम दिया, लोगों से जुड़ने का, जीवन को और गहराई से समझने का, न केवल साहित्य बल्कि जीवन के हर पहलु पर अपार कोष है जय विजय पत्रिका! मैं एल एल बी का छात्र हूँ, वक्ता हूँ, वाद विवाद प्रतियोगिताओं में स्वयम को परख चुका हूँ, राजनीति विज्ञान की भी पढाई कर रहा हूँ, इसके अतिरिक्त योग पर शोध कर एक "सरल योग दिनचर्या" ई बुक का विमोचन करवा चुका हूँ, साथ ही साथ मेरा ई बुक कविता संग्रह "कांपते अक्षर" भी वर्ष २०१३ में आ चुका है! इसके अतिरिक्त एक शून्य हूँ, शून्य के ही ध्यान में लगा हुआ, रमा हुआ और जीवन के अनुभवों को शब्दों में समेटने का साहस करता मैं... सौरभ कुमार!

4 thoughts on “*अपना गाँव*

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    अरे सौरव जी तुमने तो मेरा बचपन याद दिला दिया किओंकि मैं एक किसान का बेटा हूँ . मैंने खेतों में काम किया है . गेहूं से लेकर गन्ने तक हम ने बीजे थे . यह सरसों के खेत , नदी में छलांगें लगाना भूले नहीं सब याद हैं . वोह दिन अब से अछे थे किओंकि सवश पानी , कोई स्प्रे नहीं कोई यूरिया नहीं , घर की बनाई कम्पोस्ट . माँ के हाथ की चूलेह में सेंकी मक्की कि रोटीआं, सरसों का साग , घर का बनाया गुड़. बस वोह दिन !! वोह दिन !! वोह दिन .

  • विभा रानी श्रीवास्तव

    जो ऐसे वातावरण में जिया है वो ताउम्र भूल नहीं सकता
    आपकी रचना ये बताने में कामयाब है

  • विजय कुमार सिंघल

    अच्छी कविता. गाँव के जीवन का अपना ही आनंद है.

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