कविता

मैं भी डरने लगी हूँ

निर्भया,
कैसे लिखूँ तुम्हारी कराह…..
कैसे लिखूँ तुम्हारी पीड़ा 
तुम्हारी चीख़………
तुम्हारी पुकार….. 
ह्रदय को चीर जाता है 
तुम्हारा द्वन्द…..
एक साल हो गया ना आज 
क्या जानना चाहती हो तुम 
क्या बदला तुम्हारे बाद……………………………………….
कुछ भी नहीं शायद…..
आज भी कई विशेषज्ञ करेंगे चर्चा
कई विचारक करेंगे परिस्तिथि का पुनरवलोकन…
आज भी पक्ष कहेगा कि
सुधरी है दशा……
आज भी विपक्ष…..निकाल कर दे देगा कई आंकड़े..
आज भी कुछ लोग जलायेगें मोमबत्तियां
निकालेंगे जलूस…………..
कोसेगें समाज को …….
निकालेंगे निष्कर्ष…..
यदि ऐसा होता तो वैसा होता …………..
हा हा हा हा हा……………………..
क्या बदला तुम्हारे बाद……………………………………….
कुछ भी नहीं शायद…..
वही डर है सबकी आँखों में……….
वही निरीहता है बस
वही विवशता स्त्री होने की
वही विवशता कि चर्चा में
पीड़िता के चरित्र का भी होगा आंकलन
वही ताने…..
वही सीने को कपडे के पार देखती आँखे
वही व्यंग्य ….कटाक्ष….वही सवाल
इतनी रात को क्योँ गयीं थी तुम
तुम तो सुन भी नहीं पाओगी अब
तुम्हारे बाद क्या हुआ
क्या बदला तुम्हारे बाद……………………………………….
कुछ भी नहीं शायद…..
तुमसे सच कहूँगी आज…..
निश्चित मेरे लिए बदला है
मैं भी डरने लगी हूँ बेटी को जन्म देने से………..
मैं भी डरने लगी हूँ बेटी को जन्म देने से………..

गंगा

2 thoughts on “मैं भी डरने लगी हूँ

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    गंगा बहन , आप ने कविता में सब कुछ कह दिया जो हर बेटी के माँ बाप को डर है . भारत में यह किया हो रहा है ? हर रोज़ बुरी ख़बरें पड़ने को मिलती हैं . चार दिन शोर पड़ता है , मोम बतीआं जलती हैं , धर्म गुरु भी लड़की में ही दोष निकालने लगते हैं , फिर खामोशी . सुबह उठो एक और बुरी खबर . फिर भ्रूण हतिया कि बातें होने लगती हैं तो कौन लोग बेटी चाहेंगे . बेटी पैदा होने के बाद उस की परवरिश , पड़ावों लिखाओ , शादी करो दाज की लानत , फिर सुसराल की तकलीफें , बेटा ना हो तो तब मुसीबत !! ऐसे में लड़की की कीमत ही किया है ?

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छी भाव अभिव्यक्ति !

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