कविता

वह दरख़्त

वह दरख़्त
सहता रहा
मौसमों की मार
साल-दर-साल
लगातार
नहीं रही नमी
झर गए पत्ते
सूख गईं शाखें
तन्हा कर गए
खुद ग़रज़ सभी
नहीं पर मारता इधर
कोई परिंदा
चींटीं, गिलहरियाँ
न जाने कहाँ खो गईं
कोई राहजन
जानवर तक
आता नहीं पास
खड़ा है उदास
नितांत अकेला
निर्जन
हो गया है जड़ ।

एक मुसाफ़िर

उसके नसीब से
गुज़रा करीब से
देखा जीवन शेष
जगी संवेदना
कुछ अपनापन
लगा सींचने
प्यार से
मनोयोग से
हरिया उठा है पेड़
उसके नेह
विश्‍वास से ।

–      सुशीला शिवराण

सुशीला शिवराण

परिचय : सुशीला शिवराण जन्म : २८ नवंबर १९६५ (झुंझुनू , राजस्थान) शिक्षा : बी.कॉम.,दिल्ली विश्व विद्याीलय, एम. ए. (अंग्रेज़ी) राजस्थान विश्वषविद्या लय, बी.एड., मुंबई विश्वाविद्याbलय । पेशा : अध्यापन। पिछले बाईस वर्षों से मुंबई, कोचीन, पिलानी,राजस्थान और दिल्ली में शिक्षण। वर्तमान समय में गुड़गाँव में शिक्षणरत। रुचि : हिन्दी साहित्य, कविता पठन और लेखन में विशेष रुचि। स्वरचित कविताएँ कई पत्र-पत्रिकाओं – हरियाणा साहित्य अकादमी की ‘हरिगंधा’, अभिव्यक्तिम–अनुभूति, नव्या, अपनी माटी, सिंपली जयपुर, कनाडा से निकलने वाली ‘हिंदी चेतना’, नेपाल से निकलने वाली ‘नेवा’ सृजनगाथा.कॉम, आखर कलश, राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी की बीकानेर की जागती जोत, हाइकु दर्पण, दैनिक जागरण और अमेरिका में प्रकाशित समाचार पत्र ‘यादें’ में प्रकाशित। हाइकु, ताँका और सेदोका संग्रहों में भी रचनाएँ प्रकाशित। हरेराम समीप जी द्वाररा संपादित दोहा कोश में दोहे प्रकाशित। नेपाल से निकलने वाली ‘शब्द संयोजन’ में कविताएँ नेपाली भाषा में अनूदित और प्रकाशित जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल एवं बीकानेर साहित्य एवं कला उत्सव में एक रचनाकार के रुप में काव्यपठ तथा वक्तरव्य। ऑल इंडिया रेडियो पर अनेक बार कविता पाठ, दूरदर्शन पर दोहा-गोष्ठीव में दोहों का वाचन २३ मई २०११ से ब्लॉगिंग में सक्रिय। मेरे चिट्ठेद (वीथी) का लिंक – www.sushilashivran.blogspot.in इसके अतिरिक्तn खेल और भ्रमण प्रिय। वॉलीबाल में दिल्ली राज्य और दिल्ली विश्वपविद्या लय का प्रतिनिधित्व।

3 thoughts on “वह दरख़्त

  • अजीत पाठक

    दरख्तों के ऊपर बहुत बढ़िया कविता लिखी है.

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    बहुत अच्छी कविता है .

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छी कविता. आपने सरल शब्दों में एक वृक्ष की भावनाओं को बहुत अच्छी तरह प्रकट किया है.

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