कविता

न निराश करो मन को,

मेरे दिल ने मुझसे पूछा –

उपवन क्यों सूना सूना है,
यहाँ बहारों में भी फूल क्यूँ नहीं खिलते,
जिसे अपना बनाना चाहा था, मगर–
कभी हालात नहीं मिलते,
कभी जज़्बात नहीं मिलते,
हर तरफ छाया है एक मायूसी का आलम,
जान भी देकर यहाँ सच्चे दोस्त नहीं मिलते,
नज़रे भी मिलती हैं, चेहरे भी मुस्कुराते हैं,
पर सच है यहाँ दिल से दिल नहीं मिलते,
जैसे कहने को तो आसमां और धरा,
एक हो जाते है क्षितिज पर ,
पर यह भी नज़रों का धोखा है,
वह हकीकत में कभी नहीं मिलते,
क्यों यहाँ पे लोग झूठी कसमे खाते हैं ,
क्यों किसी मासूम का दिल दुखाते हैं ,
मिलते हैं जैसे उनका सब कुछ हैं हम ,
मतलब निकल गया तो छोड़ जातें हैं ,
मैंने कहा –
नर हो, न निराश करो मन को,
पतझड़ में भी फूल खिल जाते हैं,
अगर सच्चे दिल से ढूँढो तो —
पत्थर में भी भगवान् मिल जाते हैं,

— जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया जन्म दिन --१४/२/१९४९, टेक्सटाइल इंजीनियर , प्राइवेट कम्पनी में जनरल मेनेजर मो. 9855022670, 9855047845

One thought on “न निराश करो मन को,

  • विजय कुमार सिंघल

    वाह वाह ! बहुत खूब !!

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