लघुकथा

ख़ास दफ्तरों की आम कथा 2

हमेशा की तरह दूसरे दिन भी मुल्ला नसरुद्दीन अपने दफ्तर में रात को पहरा दे रहे थे, अचानक दफ्तर प्रमुख के कक्ष से बातें करने की आवाजें आने लगी. मुल्ला तुरन्त ऊपर पहुंचे. कमरे में झांका तो अवाक रह गए. दीवारों पर टंगी सब की सब तस्वीरें बोल रही थी. उनके चेहरों पर बेबसी थी और अन्धेरे के बावजूद चिन्ता की लकीरें साफ साफ चमकती दिखाई दे रही थी.

एक तस्वीर बोली, मुझे याद है, जब यह व्यक्ति मेरे अधीन काम करता था तो मुझसे कितनी सारी रियायतें इसने ली और मैंने परिवार का मुखिया होने के नाते सहजता से दी भी. इसे भी सभी को अपने परिवार का सदस्य मानना चाहिए और उनकी जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए.

एक दूसरी तस्वीर बोली मैंने इसकी मक्कारी को निकट से देखा है और इसे ऐसा करने से बिना कागजी कार्रवाई किए ही रोका था, परन्तु आज यह चापलूसों और मक्कारों के हाथों की कठपुतली बन कर समर्पित लोगों को परेशान करने में अपनी हेकड़ी और कौशल्य मानता है. यह तो पतन की सीमा है.

तीसरी बोली, मैंने अपने अधीनस्थों को अपना परिवार माना और उनकी तकलीफों को अपना मान कर उनका तनाव कम किया है और सभी की पदोन्नति के लिए अपनी कलम को खूब चलाया है, साथ ही अपनी जान – पहचान का उपयोग कर उनकी पदोन्नति भी करवाई है. मैंने अपनी उनचालीस साल की नौकरी में किसी भी स्थिति में किसी की भी कागजी शिकायत नहीं की. जब यह विभाग मेरा था, तो अपने लोगों का नुक्सान कर, क्या मैं सुख का अनुभव कर सकता था ? इसने तो हद ही कर डाली है, हमेशा कलम का डर दिखाकर कथित अनुशासन लाना चाहता है. मैं इसके चेहरे पर निश्छल मुस्कान अभी तक नहीं देख पाया हूं. अच्छे खासे कर्मशील विभाग में ये व्यक्ति हमेशा ऊंट की तरह टेढ़ी चालें क्यों चलता रहता है, यह मेरी समझ से परे है.

चौथी तस्वीर बोली, बड़े पद के बड़प्पन को मैंने सदैव धारण किए रखा. मुझे आज भी लोग सम्मान के साथ याद करते हैं. चापलूस, चुगलखोर, कामचोर, मक्कार और शातिर लोग मेरे इस कमरे के पास फटकते ही नहीं थे, उनकी रूहें कांपती थी. आजकल तो इस कमरे में उनका ही मजमा लगा रहता है, उन्हें खुलेआम छूटें दी जा रही हैं, निर्धारित से ज्यादा छुट्टियां भी दी जा रही हैं और काम करने वाले अनुशासनहीनता के आरोपों का जवाब देते फिरते हैं. कितना दुर्भाग्यपूर्ण है. हे भगवान, मैंने तो कभी सपने भी नहीं सोचा था कि मेरे विभाग का ऐसा हश्र होगा ?

पांचवीं बोली, मेरा तो अनुभव यह है कि सम्मान दो, तो खूब सम्मान मिलेगा. इसे मैंने अपनी जिन्दगी में खूब आजमाया है. मैंने तो अपने अधीनस्थों को ही नहीं बल्कि यहां आने वाले आम नागरिकों तक को हमेशा ही सम्मान और स्नेह दिया है. मैंने एक नया प्रयोग भी किया था, जो बेहद सफल रहा. उसके तहत अपने अधीनस्थों की उपलब्धियों को विभागीय उपलब्धि निरूपित करना शुरू किया तो सम्बन्धित व्यक्ति को विभागीय और संस्थागत सम्मान भी मिलता था और विभाग को श्रेष्ठता का खिताब भी मिलता रहता था. इसी के चलते मेरे जमाने में विभाग ने खूब नाम कमाया था.

छठीं तस्वीर बोली, ये प्रमुख तो बड़ा अजीब है, जरा जरा सी बात में उच्चाधिकारी और उच्चाधिकारियों के पास शिकायत लेकर चला जाता है. जरा – सा विभाग है और पता नहीं किस अपेक्षा या नीयत से जासूस लगा रखे हैं, जासूस अपना आवंटित काम करते नहीं हैं तो कोई बात नहीं परन्तु बिचारे काम करने वाले जरा से इधर उधर हुए कि उन पर अनुशासनहीनता और कदाचरण का आरोप मढ़ दिया जाता है. और तो और कक्ष में आने वालों की बातें मोबाइल पर रिकार्ड करता है. खुद में सत्य सुनने की हिम्मत नहीं है, झूठे आरोप मढ़ दिए जाते हैं. कोई सप्रमाण अपना पक्ष रखे तो उस बिचारे की बात कदापि नहीं सुनी जाती है. कोई जाए तो कहां जाए ? उच्चाधिकारी के लिए विभाग प्रमुख की बात अन्तिम सत्य होती है और सच्चा व्यक्ति भीतर ही भीतर बेचारगी महसूस कर मन मसोसकर रह जाता है. मुझे तो इस कक्ष में तस्वीर के रूप में भी टंगा रहना नागवार लगने लगा है.

इतने में सभी तस्वीरें एक साथ बोली, अब तो इस कमरे में हमें भी बहुत ज्यादा घुटन लगने लगी है. एक तस्वीर बोली, जरा सोचो तो, कल को यह सेवानिवृत्त होगा तो इसकी भी तस्वीर हमारे पास ही लगेगी, फिर क्या करोगे ? इतना सुनते ही सारी तस्वीरें एक के बाद एक गिरने लगीं.

मुल्ला नसरुद्दीन यह नजारा देखकर उदास होकर धीरे धीरे नीचे आया और सिर पर हाथ रखकर बेबसी की चादर ओढ़कर पहरा देने लगा.

डॉ.मनोहर भण्डारी

One thought on “ख़ास दफ्तरों की आम कथा 2

  • विजय कुमार सिंघल

    करारा व्यंग्य !

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