सामाजिक

जानिए क्यों है समाज में विधवा वेश्या समान-रांड और रंडी शब्द

इस होली पर एक सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण घटना घटी, ये घटना ऐसी थी की जिसने सैकड़ो सालो से चली आ रही एक अमानविय प्रथा को तोड़ दिया है। इस होली पर वृंदावन की विधवाओं ने सौकडो सालो से चले आ रहे धर्म के उस अमनवीय प्रतिबंध को तोड़ दिया जिसमे उन्हें अपने बेरंग जीवन को दुबारा रंगो से रंगने पर प्रतिबंध लगा रखा है ।

वृन्दावन की विधवाओं ने इस बार होली मनाई और एक दूसरे पर रंग उड़ेलती हुई ख़ुशी में नाचीं । मानाई जा रहा है की ऐसा 600-700 साल बाद हुआ है , इतने सालो बाद इस अमानवीय प्रथा को तोडा गया है परन्तु आस्चर्य यह था की मुख्य मिडिया में इसकी कोई खबर नहीं थी ।निश्चय ही यह घटना शनिमंदिर के गर्भगृह तक महिलाओ के जाने या शनि देव की मूर्ति की पूजा करने से कंही अधिक महत्वपूर्ण रही पर दुःख है की देश ने इस घटना को बहुत हलके से लिया।

हिन्दू धर्म में विधवाओं की कोई हैसियत नहीं है , विधवाओं को अपशकुन समझा जाता है शुभ कार्यो में उनकी उपस्थिति वर्जित है ।धर्म के ठेकेदारो, पण्डे पुजारियों ने विधवाओं पर तरह तरह के प्रतिबंध लगा दियें हैं , वे रंगीन कपडे नहीं पहन सकती , आभूषण नहीं पहन सकती , श्रृंगार नहीं कर सकती यंहा तक की वे ठीक ढंग से भोजन तक नहीं कर सकतीं । पुरोहितो ने विधवाओं सामान्य जीवन जीने से वंचित कर उन्हें मौत से भी बदतर जीवन जीने पर मज़बूर कर दिया ।

पुरोहित वर्ग का विधवाओं के प्रति घृणा इस पर ही नहीं रुकी , उसने विधवाओं को ‘रांड ‘ कह अपमानित ही नहीं किया बल्कि रांड शब्द को विकृत कर ‘ रंडी ‘ बना डाला जिसका अर्थ उसने ‘ वेश्या ‘ का पर्याय कर दिया ।
शिक्षार्थी हिंदी शब्दकोष में ‘रंडी ‘ का अर्थ इस प्रकार लिया गया है –
1-धन लेके व्यविचार करने वाली स्त्री,वेश्या
2-बेवा, विधवा

इसी प्रकार वृहत हिंदी कोष में ‘रांड’ शब्द का अर्थ लिया गया है – बेवा , जिसका पति मर गया हो, वेश्या , रंडी, विधवा और वेश्या के लिए एक ही शब्द का होना विधवा को वेश्या समझना या वेश्या को विधवा समझने के समान है । क्या हर विधवा वेश्या होती है ? क्या हर वेश्या विधवा होती है ? फिर दोनों शब्दों का अर्थ एक ही क्यों रखा गया ? पुरोहित वर्ग की यह कौन सी धूर्तता थी ?

काशी के लिए एक कहावत मशहूर है ” रांड, सांड, सीढ़ी , सन्यासी … इनसे बचे तो पाये काशी ‘ यंहा ‘रांडो, सीढ़ियों, सन्यासियो और सांडो की बहुतायत को दर्शाने के लिए कहावत कही गई है । परन्तु यंहा ‘रांड’ का अर्थ क्या लिया जाए ? वेश्या या विधवा और किस आधार पर लिया जाए?

स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने ऋग्वेद का भाष्य करते हुए लिखा है “विधवेव देवरम’ (मंडल 10,सूक्त 40, मन्त्र 2) अर्थात जैसे विधवा अपने देवर को संतानोत्पात्ति के लिए चारपाई पर बुलाती है वैसे ही तुम भी करो” उनके अनुसार देवर का अर्थ होता है दूसरा पति ।

ग्यारहवीं शताब्दी के रचित ‘प्रबोधचंद्रोदयनाट्कम्’ जो की संस्कृत का नाटक है उसमे रंडा शब्द विधवा के लिए प्रयोग हुआ है – रंडा:पींपयोधर: (3/18) जबकि उससे बहुत पहले लिखे गए पंचतंत्र जो की शायद चौथी शताब्दी की संस्कृत रचना है उसमे रंडा शब्द वेश्या के लिए प्रयोग किया गया है। तब कैसे जो शब्द चौथी शताब्दी में वेश्या के लिए प्रयोग होता था वह बाद में विधवा के लिए प्रयोग होने लगा?कौन दोषी है विधवाओ के इस अपमान के लिए ?

यंहा एक और बात ध्यान दीजिये , रांड या रंडी का एक ही पुल्लिंग होता है ‘ रंडुआ ‘ या ‘ रंडवा’ जो की केवल इतना अर्थ देता है – जिसकी पत्नी मर गई हो ।जबकि अर्थ यह होना चाहिए की रंडवा का अर्थ वेश्यागामी भी होना चाहिए था । पर ऐसा नहीं है ? केवल स्त्री विधवा के लिए वेश्या शब्द का प्रयोग हुआ … ऐसा क्यों ? शायद इसलिए की स्त्री पुरुषो की दासी रही है अत: पुरुष ने अपने लिए अपमानजनक शब्द का प्रयोग नहीं होने दिया .. रंडवा होके भी ।

वृंदावन की विधवाओं ने होली खेल के छोटा सा ही सही पर अपने ऊपर थोपे गए धर्म की अमानवीयता का विरोध तो किया … जल्द ही वो दिन भी आएगा जब यह अमानवीय प्रथा ध्वस्त हो जायेगी और धर्म के ठेकेदार मुंह बाए केवल देखते रहेंगे । मेरा पूरा समर्थन है उन्हें ।

केशव (संजय)

 

संजय कुमार (केशव)

नास्तिक .... क्या यह परिचय काफी नहीं है?

2 thoughts on “जानिए क्यों है समाज में विधवा वेश्या समान-रांड और रंडी शब्द

  • बहुत अच्छा लेख .

  • बहुत अच्छा लेख .

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