धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

फादर कामिल बुल्के लिखित “रामकथा : उत्पत्ति और विकास” शोधग्रंथ समीक्षा से परे एक समग्र रामकोष

’रामकथाः उत्पत्ति एवं विकास’ हिन्दी की सेवा के प्रति सर्वतोभावेन समर्पित विद्वान डॉ. कामिल बुल्के द्वारा लिखित एक असाधारण ग्रंथ है। वे शोध एवं इतिहास को किसी विषय के स्रोत तक पहुंचने का महत्वपूर्ण साधन मानते थे। यह ग्रंथ वास्तव में फादर कामिल बुल्के का एक शोधप्रबंध (थेसिस) है जिसे उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में डी-फिल उपाधि के लिये प्रस्तुत किया था। इस ग्रंथ में डॉ. बुल्के की वैज्ञानिक दृष्टि और साहित्य की संवेदनशीलता का गहरा एवं तात्विक संतुलन दृष्टिगोचर होता है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि ’रामकथा-उत्पत्ति और विकास’ हिन्दी-साहित्य को डॉ. कामिल बुल्के का अप्रतिम अवदान है। यह उनके अगाध अध्ययन, अपने कार्य के प्रति असाधारण निष्ठा, तलस्पशिंनी दृष्टि, अपार तथ्य-मंथन एवं विश्लेषण क्षमता से निष्पन्न अभूतपूर्व महाप्रबंध है।

सम्पूर्ण ग्रंथ चार भागों एवं 21 अध्यायों में विन्यस्त है। प्रथम भाग के अध्ययन का मुख्य विषय ’प्राचीन रामकथा साहित्य’ है जिसका विस्तृत अध्ययन वैदिक साहित्य, वाल्मीकि कृत रामायण, महाभारत, बौद्ध रामकथा तथा जैन रामकथा के पांच अध्याओं में समाहित है। डॉ. बुल्के के मतानुसार वैदिक साहित्य में यत्र-तत्र रामायण के पात्रों की चर्चा अवश्य है, परन्तु रामकथा से उनका संबंध कितना है, इसे स्थापित करना कठिन है। ऋग्वेद में दशरथ का नाम दानस्तुति में अन्य राजाओं का उल्लेख करते हुए केवल एक बार आया है। वैदिक साहित्य में कई राम हैं। तैत्तरीय आरण्यक में राम शब्द का प्रयोग ’पुत्रा’ के अर्थ में किया गया है। प्रवग्र्य (सोमयज्ञ के पूर्व की एक विधि) का अनुष्ठान करने वाले नियमों का निदेश करते हुए कहा गया है- ’’वह एक वर्ष तक मांस-भक्षण न करे, स्त्री-गमन न करे, मिट्टी के बर्तन में पानी न पिये, उसका पुत्रा उच्छिष्ट न पिये आदि।’’ ऋग्वेद में राम का उल्लेख एक बार राजा के रूप में हुआ है। जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण में राम का उल्लेख दो स्थलों पर शिक्षक के रूप में है। इसी प्रकार सीता वहाँ कृषि की अधिष्ठात्री देवी हैं। तैत्तरीय ब्राह्मण में सीता, सावित्री सूर्य की पुत्री के रूप में उल्लिखित हैं, कृष्णाजुर्वेद के तैत्तरीय ब्राह्मण में ब्रह्मा की दो पुत्रियाँ हैं- सीता और श्रद्धा। डॉ. बुल्के इस संबंध में अपना मत देते हुए लिखते हैं- वैदिक रचनाओं में रामायण के एकाध पात्रों के नाम अवश्य मिलते हैं, लेकिन न तो इसके परस्पर संबंध की कोई सूचना दी गयी है न इसके विषय में रामायण की कथावस्तु में किंचित भी निर्देश किया गया है।

द्वितीय भाग ’रामकथा की उत्पत्ति- दशरथ जातक की समस्या, रामकथा का मूलस्रोत एवं प्रचचित वाल्मीकिकृत रामायण के कुछ मुख्य प्रक्षेप तथा रामकथा का प्रारम्भिक विकास आदि शीर्षकों के अन्तर्गत जाँचा-परखा गया है। ’दशरथ-जातक’ को डॉ. बुल्के वृत्तांत ब्राह्मण’ की रामकथा का विकृत रूप मानते हैं। रामायण की अंतरंग समीक्षा करने पर बहुत से विद्वान इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि अध्योध्याकांड की घटनाएँ अत्यंत स्वाभाविक हैं तथा लंका की घटनाएँ अलौकिक और काल्पनिक प्रतीत होती हैं। वास्तव में रामकथा के इन दो भागों में अन्तर अवश्य पाया जाता है, लेकिन इसे समझने के लिए रामकथा के भिन्न आधार मानने की आवश्यकता नहीं है। रामायण के इस द्वितीय भाग का प्रधान विषय है- सीताहरण और उसके कारण युद्ध। अयोध्या से राम के निर्वासन के समान यह भी अत्यंत साधारण घटना प्रतीत होती है, अतः कथावस्तु के दृष्टिकोण से दो भागों में कोई मौलिक अन्तर नहीं है। वे रामायण की कथा के उत्तर पक्ष को वैदिक कथा-प्रतीकों तक खींच ले जाने की आवश्यकता नहीं समझते। आदिवासी जातियों में आज भी कई ऐसी परम्पराएँ सुरक्षित हैं जो इस पक्ष को पूर्णतः लौकिक एवं स्वाभाविक कथा सिद्ध करने में समर्थ है। सबसे स्वाभाविक अनुमान यह है कि आजकल के आदिवासियों के समान उन जातियों के विभिन्न कुल विभिन्न पशुओं और वनस्पतियों की पूजा करते थे।

तृतीय भाग का मुख्य विषय- अर्वाचीन रामकथा का सिंहावलोकन है, जिसे विश्लेषण की दृष्टि से संस्कृत धार्मिक साहित्य में रामकथा, संस्कृत ललित साहित्य में रामकथा, आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामकथा तथा विदेशों में रामकथा शीर्षकों में विभाजित किया गया है।

चतुर्थ अध्याय का मुख्य विषय- रामकथा का विकास है- जो रामायण के सात काण्डों- बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, युद्ध काण्ड, उत्तरकाण्ड आदि से सम्बद्ध विशद सामग्री के अध्ययन-विश्लेषण पर आधारित है। डॉ. बुल्के के मतानुसार- संस्कृत धार्मिक साहित्य में राम का स्थान अपेक्षाकृत कम व्यापक है। कारण यह है कि एक तो वैदिक साहित्य के निर्माण काल में रामकथा प्रचलित नहीं थी। दूसरे, रामभक्ति की उत्पत्ति के पूर्व जनसाधारण के धार्मिक जीवन में रामकथा के लिए विशेष स्थान नहीं था। वैदिक साहित्य में रामकथा का नितान्त अभाव है। रामभक्ति के विकास के साथ-साथ साम्द्रायिक रामायण तथा संहिताओं का प्रचलन हुआ, जिनमें अध्यात्म रामायण, अद्भुत रामायण, आनन्द रामायण, तत्वसंग्रह रामायण आदि उल्लेखनीय हैं। संस्कृत ललित साहित्य के स्वर्णकाल के विशिष्ट कवियों ने रघुवंश, उत्तररामचरित जैसी कालजयी कृतियाँ अवश्य प्रस्तुत थी। आधुनिक भारतीय भाषाओं में कंवनकृत तमिल रामायण, तेलुगु द्विपद रामायण, मलयालम रामचरितम, असमिया माधवकंदली रामायण, बंगाली कृत्तिवास, हिन्दी रामचरित मानस, उड़िया बलरामदास रामायण तथा मराठी में भावार्थ रामायण, कश्मीरी रामायण रामकथा के विकास की महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं, जिन्होंने लोक जीवन को प्रभावित किया।

इस ग्रंथ के उपसंहार के अन्तर्गत रामकथा की व्यापकता, विभिन्न रामकथाओं की मौलिक एकता एवं अवतारवाद आदि का विवेचन करते हुए इस शोध कार्य की उपलब्धियों को विन्यस्त किया गया है।

इस ग्रंथ में डॉ. बुल्के का विवेचन यह दर्शाता है कि वासुदेव कृष्ण सम्भवतः तीसरी शताब्दी पूर्व से विष्णु के अवतार माने जाने लगे थे, जिससे अवतारवाद की भावना को बहुत प्रोत्साहन मिला था। दूसरी ओर रामायण की लोकप्रियता के साथ-साथ राम का महत्व भी बढ़ने लगा था, उनकी वीरता के वर्णन में अलौकिकता भी आ गयी थी। इस प्रवृत्ति की स्वाभाविक परिणति यह हुई कि कृष्ण की भांति राम भी सम्भवतः पहली शताब्दी ई.पू. के अवतार के रूप में स्वीकृत होने लगे थे। परवर्ती रामकथा में कृष्णकथा के कई प्रसंग नाम एवं प्रसंग भेद से सम्मिलित किये गये। डॉ. बुल्के ने रामकथा में कृष्णचरित के परवर्ती विकास को पात्र-साम्य की दृष्टि से रखा है। राम तथा कृष्ण के अतिरिक्त सीता-सुभद्रा तथा लक्ष्मण-बलभद्र की अभिन्नता का भी प्रतिपादन किया गया है। सीता के विषय में माना गया है कि वह कृष्णावतार में कृष्ण की पत्नी (रुक्मिणी) बन कर दस पुत्री तथा एक पुत्री उत्पन्न करेंगी। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित पात्रों की अभिन्नता का उल्लेख मिलता है- मन्थरा-पूतना, शूर्पणखा और कुब्जा, वालि और भील, अयोध्या का धोबी और कंस का धोबी, जाम्बान और जाम्वती का पिता, वानर और गोप और इसके साथ ही रासलीला आदि के अनेकानेक प्रसंग रामकथा से जुड़ते चले गये। दूसरी ओर विकास क्रम में जैसे-जैसे विष्णु ने इन्द्र का, शिव ने ब्रह्मा का स्थानान्तरण किया वैसे-वैसे रामकथा के विविध प्रसंगों में भी ऐसे परिवर्तन आते चले गये। राम ने किसी रामायण में एक ही प्रसंग पर ब्रह्मा की आराधना की, तो किसी अन्य रामायण के उसी प्रसंग में शिव या शक्ति की। भारतीय संस्कृति के विकास की यह एक अलग गाथा है। डॉ. बुल्के ने अपने इस प्रबंध में समय के इन यात्री-पदचिह्नों को बड़ी सावधानी एवं विस्तार के साथ अंकित किया है। इस प्रबंध की अनन्यता का दूसरा क्षेत्रा है, रामकथा के प्रमुख एवं गौण पात्रों पर देश-विदेश में प्राप्त सामग्री का विशद संकलन एवं विवेचन। डॉ. बुल्के ने रावण, हनुमान व सीता के साथ परशुराम, शबरी, त्रिजटा, मंदोदरी, विभीषण इन्द्रजित, शत्रुघ्न आदि पात्रों पर भी प्रभूत सामग्री प्रस्तुत की है तथा रावणवध के पश्चात् गर्भवती सीता के वनवास पर तो उसने विविध कथाओं का एक अलग संसार ही खड़ा कर दिया है।

रामकथा ने इतिहास और भूगोल की इतकी लम्बी यात्रा की है, नर से नारायण काव्य बनने तक इतने धर्मों, संस्कृतियों, विश्वासों, आस्थाओं से युग-युग में उसका सामना हुआ है कि उसकी कथा में अन्तर-परिवर्तन अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। भिन्न-भिन्न कालों में राम के कोटि-कोटि अवतार हुए हैं। अतः इन असंख्य अवतारों के कारण कथा कुछ-कुछ अन्तर-प्रत्यन्तर अस्वाभाविक नहीं लगता। पहले-पहल बौद्धों ने इस कथा का विदेशों में प्रचार-प्रसार किया। क्रमशः तीसरी और पाँचवी शताब्दी में ’दशरथ-जातक’ का चीनी भाषा में अनुवाद हुआ। तत्पश्चात् नवीं श.ई. में तिव्बती तथा खेतानी रामायणों से उसे उत्तर में फैलने का अवसर मिला। हिन्देशिया तथा हिन्दचीन में वाल्मीकीय रामायण प्राचीन काल से ही ज्ञात है। जावा, कम्बोदिया, स्याम में राम-नाटक आज भी लोकप्रिय हैं। इसके अलावा भारतीय भाषाओं में तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, बंगला, असमी, मराठी, उड़िया, गुजराती, उर्दू-फारसी एवं विदेशी भाषाओं में डच, स्पैनिस, फ्रेंच, जर्मन, पुर्तगाली आदि भाषाओं में उपलब्ध अनेकानेक रामकथाओं का अध्ययन-विवेचन प्रस्तुत किया है। इसके अलावा रामकथा की प्रक्षिप्त सामग्री पर विचार करते हुए उन्होंने हिन्दू, बौद्ध, जैन धर्म तथा अवतारवाद एवं उसके प्रभावों की गहराई से छान-बीन की है, तथा उसके पात्रों एवं कथानक के विविध अंगों पर विपुल सामग्री प्रस्तुत कर उनका विश्लेषण किया है।

इस प्रबंध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पाठक को देश-विदेश, विभिन्न भाषाओं में लिखित-अलिखित रूप से व्याप्त रामकथाओं के विराट धतराल पर ला खड़ा करता है, जहाँ उसे इस कथा के अनेकों क्षितिजों का एक साथ साक्षात्कार होता है।

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । इसके अलावा जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा प्रकाशक एवं संपादक राघवेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशनाधीन महिला रचनाकारों की महत्वपूर्ण पुस्तक "भारत की प्रतिभाशाली कवयित्रियाँ" और काव्य संग्रह "प्रेम काव्य सागर" में भी डॉ. शुभ्रता की कविताओं को शामिल किया गया है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली)द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्राके साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है। इसी वर्ष सुभांजलि प्रकाशन द्वारा डॉ. पुनीत बिसारिया एवम् विनोद पासी हंसकमल जी के संयुक्त संपादन में प्रकाशित पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न कलाम साहब को श्रद्धांजलिस्वरूप देश के 101 कवियों की कविताओं से सुसज्जित कविता संग्रह "कलाम को सलाम" में भी डॉ. शुभ्रता की कविताएँ शामिल हैं । साथ ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में डॉ. मिश्रा के हिन्दी लेख व कविताएं प्रकाशित होती रहती हैं । डॉ शुभ्रता मिश्रा भारत के हिन्दीभाषी प्रदेश मध्यप्रदेश से हैं तथा प्रारम्भ से ही एक मेधावी शोधार्थी रहीं हैं । उन्होंने डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से वनस्पतिशास्त्र में स्नातक (B.Sc.) व स्नातकोत्तर (M.Sc.) उपाधियाँ विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान के साथ प्राप्त की हैं । उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से वनस्पतिशास्त्र में डॉक्टरेट (Ph.D.) की उपाधि प्राप्त की है तथा पोस्ट डॉक्टोरल अनुसंधान कार्य भी किया है । वे अनेक शोधवृत्तियों एवम् पुरस्कारों से सम्मानित हैं । उन्हें उनके शोधकार्य के लिए "मध्यप्रदेश युवा वैज्ञानिक पुरस्कार" भी मिल चुका है । डॉ. मिश्रा की अँग्रेजी भाषा में वनस्पतिशास्त्र व पर्यावरणविज्ञान से संबंधित 15 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ।

2 thoughts on “फादर कामिल बुल्के लिखित “रामकथा : उत्पत्ति और विकास” शोधग्रंथ समीक्षा से परे एक समग्र रामकोष

  • लीला तिवानी

    प्रिय सखी शुभ्रता जी. फादर कामिल बुल्के लिखित “रामकथा : उत्पत्ति और विकास” शोधग्रंथ पर अत्यंत शोधपूर्ण सार्थक आलेख के लिए आभार.

    • डॉ शुभ्रता मिश्रा

      धन्यवाद मेडम

Comments are closed.