कविता

कविता : कड़वे घूँट

ज़िंदगी
जैसे एक समझौता बन कर रह गई है,
अपने दिल की आरज़ू और ख्वाइशे—
जैसे नदिया में बह गई हैं ,
न दिल की सुन पाते हैं ,
न दिल की कर पाते हैं,
बस हालात से मज़बूर होकर –
दोस्ती, रिश्तेदारी नौकरी और दुनिया,
सबकी सुनकर,
मन को समझा कर.
जिसकी जैसी ज़रुरत हो–
वैसा ही काम कर जाते हैं-
अपनों को अपना बताकर
रिश्तों को रिश्ते बनाकर
जीवन में साथ निभाना,
न चाह कर भी कहीं जाना
न चाह कर भी मुस्कुराना
दिल की दिल में दबा कर
बस हाँ में हाँ मिलाना,
सब कुछ —
जैसे एक समझौता है ज़िंदगी का
और हम सब यही समझौता कर
अपनी अपनी ज़िंदगी ज़ी रहें हैं–
और न चाहते हुए भी
पल पल कड़वे घूँट पी रहे हैं

जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया जन्म दिन --१४/२/१९४९, टेक्सटाइल इंजीनियर , प्राइवेट कम्पनी में जनरल मेनेजर मो. 9855022670, 9855047845

2 thoughts on “कविता : कड़वे घूँट

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छी कविता ! यह सत्य है कि जिंदगी में हमें अनेक समझौते करने पड़ते हैं.

    • जय प्रकाश भाटिया

      Dhanyvad Vijay ji,

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