राजनीति

लेख– लोकतंत्र में ठहरी हुई संसद का कोई औचित्य नहीं!

बड़ी दुःखद और शर्मनाक स्थिति है, उस जनतांत्रिक देश में। जहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था अपने आप को जनता की सेवक कहती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि जन-गण-मन की आशा के केंद्र संसद में पूरा बजट सत्र राजनीतिक तू-तू, मैं-मैं में निकल गया। बजट सत्र का दूसरा हिस्सा भी समाप्त हो गया, पर 24 लाख करोड़ रुपए ख़र्च करने के बाद भी जनसरोकार के किसी विषय पर गम्भीर चर्चा और राजनीतिक विचार-विमर्श संसद में नहीं हो सका। ऐसा उस काल-परिस्थिति में हो रहा, जब महंगाई लोगों का कमर तोड़ रहीं, सरकारी योजनाएं सफ़ल हो नहीं पा रहीं। देश में सामाजिक और जातीय वैमनस्यता बढ़ रहीं।
भारत सरीखे बहुदलीय लोकतंत्र में जहां राजनीतिक दल कुकुरमुत्ते की तरह हर गली और मुहल्ले में उत्पन्न होने लगे हैं। ऐसे में संसद में थोड़ा-बहुत हो-हल्ला, हंगामा और गतिरोध होना स्वाभाविक है, लेकिन अगर संसद चलेगी ही नहीं तो फिर वह अपनी महत्ता खोने का काम ही करेगी। यदि संसद में देश के समक्ष उपस्थित ज्वलंत समस्याओं पर चर्चा और जरूरी विधेयकों पर बहस नहीं होगी। तो फिर उसे लोकतंत्र का मंदिर अथवा जन-आकांक्षाओं का मंच कहने का कोई औचित्य नहीं।आखिर ऐसी संसद किस काम की। जिसमें कोई काम ही न हो सके?

संसद की कार्यवाही में गिरावट कोई आज की समस्या नहीं है, यह एक परिपाटी बन चुकी है। ऐसे में सांसद किसी मसले पर विरोध जताने के लिए अगर संसद की छत पर चढ़ जाएं। इसके अलावा शपथ ग्रहण के तत्काल बाद पीठासीन अधिकारी के समक्ष हंगामा करने पहुंच जाएं। तो यह सब संसद की दयनीय स्थिति को व्यक्त करती है। साथ में यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए कतई सही नहीं। अगर सिर्फ़ इस बार के बजट सत्र के दौरान चर्चा की बात की जाएं, तो लोकसभा में बजट पर सिर्फ़ साढ़े 14 घण्टे चर्चा हुई। तो वहीं राज्यसभा में यह आंकड़ा 10.9 घण्टे का ही रहा। जोकि अपने पूर्ववर्ती समय से काफ़ी कम रहा। पहले बजट पर एक अनुमान के मुताबिक 33 घण्टे चर्चा होती थी। इतना ही नहीं इस बार के बजट सत्र में प्रश्नकाल के लिए निर्धारित समय का भी उपयोग सार्थक ढंग से नहीं हुआ। लोकसभा में प्रश्नकाल के 16 फ़ीसद समय का उपयोग हुआ, तो राज्यसभा में 5 फ़ीसद। ऐसे में प्रश्नों की लंबी कतार खड़ीं दीगर होती है। पर जाति-धर्म की रस्सी पकड़ कर चुनावी वैतरणी पार करने वालों को फ़िक्र कहाँ किसी बात की। उन्हें तो अपने राजनीतिक स्वहित से अधिक दिखना ही शायद बंद हो गया है। जब संसद में नीतियां बन नहीं रही। बन रहीं तो गहन विचार-विमर्श को ताक पर रखकर काम हो रहा। ऐसे में लोकतंत्र की मंदिर कही जाने वाली इन संस्थाओं का कोई अस्तित्व समझ में अब आता नहीं, क्योंकि इस लोकतांत्रिक मन्दिर का कोई वजूद अगर हमारे सियासतदां समझते। तो जनता की गाढ़ी कमाई से चलने वाली व्यवस्था का समय बेजा का जाया नहीं करते।

अब, जब बजट सत्र ख़त्म हो गया है। तब भले ही पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे पर संसद न चलने देने का राजनीतिक आक्षेप कर रहें। लेकिन अब अवाम तो सब जानती है, और वर्षों से देखती भी आ रहीं है। जिसका आंकलन यहीं है, कि शायद संसद चलाने की मंशा बीते कुछ वर्षों से कमजोर ही पड़ी है। फ़िर पक्ष-विपक्ष में कोई भी हो। यह मायने नहीं रखता। बजट सत्र बेफिजूल का व्यर्थ चले जाने के बाद इस बार तो नए तरीक़े का राजनीतिक स्वांग रचा जा रहा। सत्ता पक्ष के सांसद सदन न चलने के कारण वेतन-भत्ते न लेने की बात कर रहें, तो विपक्ष सत्तासीन दल की हठधर्मिता और उसकी ग़लत नीतियों को सदन न चलने का उत्तरदाई मान रहीं। ऐसे में कुछ भी हो, लेकिन अन्याय तो उस जनता के साथ हो रहा। जो इस लिए अपने निर्वाचन क्षेत्र से जनप्रतिनिधियों को चुनकर भेजती है, कि वे उनके हक की आवाज़ जनतंत्र में बनेंगे। इसके साथ नुकसान तो संसद रूपी लोकतांत्रिक मंदिर औऱ उस लोकतांत्रिक मंदिर के वसूलों का हुआ। जो अभी अल्पविकसित और अपरिपक्व स्थिति में है। साथ में अगर हमारी संसद राष्ट्रपति द्वारा वर्ष में तीन बार आहूत पाने के बाद भी वैश्विक फ़लक पर कामकाज के घण्टे और वार्षिक बैठकों में पिछड़ रहीं। तो इसका सीधा सा अर्थ यहीं है, जनहितार्थ की भावना भारतीय लोकतंत्र में कमज़ोर पड़ रही। उस करोड़ों की जनसंख्या के प्रति लोकतांत्रिक संवेधनाएँ अमूर्त हो चुकी है, जिसको आजादी के सत्तर बसंत बाद भी खाने के लिए दो वक़्त का रोटी और नमक नसीब नहीं हुआ है। उन लोगों के जीवन में उजाला लाने की इच्छाशक्ति शायद हमारी व्यवस्था भूल चुकी, जो अभी तक मुख्यधारा से नहीं जुड़ सकी है।

यहां पर अगर हम बात विश्व के अन्य देशों में वार्षिक बैठकों और संसदीय संस्कृति में कार्य के घण्टों की करें। तो इंग्लैंड की प्रतिनिधि सभा में 140 दिन बैठक और लगभग 1700 घण्टे कार्यवाही, अमेरिका में 136 दिन बैठक तो 2000 कार्यवाही, आस्ट्रेलिया में 64 दिन बैठक तो वहीं 624 घण्टे कार्यवाही एक वर्ष के भीतर होती है। अगर इस तक़ाज़े पर भारतीय संसद को देखे, तो हमारी संसद साल में 64 दिन बैठक करती है, तो वहीं बहस के घण्टे भी अन्य देशों के मुकाबले काफ़ी कम 337 घण्टे हैं। यह सब साबित करता है, कि संसद की मान-मर्यादा और गरिमा का लगातार क्षरण हो रहा। तो यह उक्ति अतिश्योक्ति आज के दौर में नहीं लगती, क्योंकि आज के दौर में हमारे जनप्रतिनिधियों की रुचि रचनात्मक विचार-विमर्श में नहीं। बल्कि संसद में हंगामे और शोर-शराबे का मंचन करने में काफ़ी रहीं है। अगर हालिया बजट अधिवेशन के दूसरे सत्र की ही बात करें, तो लोकसभा का दूसरे चरण में लगभग 127 घण्टे व्यर्थ गए। तो राज्यसभा का 124 घण्टा। जो यह साबित करता है, कि लंबे अर्से से हमारी संसद के प्रतिनिधि स्वार्थपरकता से ऊपर उठकर नहीं देख पा रहें। जिस कारण संसद की प्रतिष्ठा और गरिमा लगातार रसातल में जा रहीं है। लेकिन पता नहीं क्यों नए नियम बनाने की दिशा में क़दम बढ़ाने से हमारी व्यवस्था कतरा रहीं है। जिससे संसद सुचारू रूप से चल सके।

अगर हम बात इंग्लैंड, अमेरिका और अन्य विकसित देशों की करें, तो उन देशों में तो ऐसी घटनाएं लगभग शून्य के बराबर होती है। जो आज के दौर में भारतीय संसद का पर्याय बनता जा रहा। अगर सांसदों के मूल वेतन की बात करें, तो 1अप्रैल 2018 से इनका वेतन बढ़ाकर एक लाख रुपए कर दिया गया है। इसके अलावा संसदीय भत्ता भी 45000 से बढ़ाकर 70,000 मासिक कर दिया गया है। इसके साथ ऑफिस से ज़ुड़े भत्ते को 60,000 मासिक तो फर्नीचर के लिए मिलने वाला भत्ता भी बढ़ाकर 1 लाख कर दिया गया है। साथ में राजनीतिक पारी ख़त्म करने के बाद का पेंशन पच्चीस हज़ार रुपए महीनें। तो क्या आज की स्थिति में देश के भीतर ज्वलंत विषयों की कमी पड़ गई है। या लंबित पड़े विधेयकों की। जो सिर्फ़ हंगामे की ख़ातिर अवाम के पैसे इन प्रतिनिधियों पर व्यर्थ उड़ेला जा रहा। अब लगता यहीं है, पक्ष और विपक्ष के राजनीतिक मतभेद ने संसद को ही बंधक बना लिया है। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा, क्योंकि बीते 18 वर्षों में पहली दफ़ा ऐसा है। जब संसद ने सबसे कम काम करने की उपलब्धि हासिल की है। संसद की यह रवायत संसदीय इतिहास को ही शर्मिंदा नहीं कर रहीं, बल्कि यह भी रेखांकित कर रहा कि भारतीय लोकतंत्र औंधे मुंह होता जा रहा। इन सब बातों के ज़िक्र के बाद अगर देश में आज भी एक बड़ा तबका मौलिक अधिकारों से वंचित है। संविधान के लागू होने के लगभग 67 वर्षों के बाद भी भारतीय संविधान में उल्लेखित अधिकारों के लिए जदोजहद चल रही है। स्वास्थ्य, शिक्षा औऱ मकान सभी के हिस्से तक नहीं पहुँच सका है। समानता और समता की भावना पूर्ण रूप से अभी तक पनप नहीं पाई है। समाज में जातिगत असमानता से लेकर आर्थिक असमानता व्याप्त है। तो अब जनप्रतिनिधियों के लिए लिए नो वर्क, नो पे की नीति बननी चाहिए। साथ मे संसद में काम की संस्कृति निर्मित करने के लिए संसद में सभी की न्यूनतम उपस्थित औऱ सवाल पूछने की प्रथा शुरू करना होगा। ऐसा न करने वालों का सत्र से निलंबन औऱ वेतनमान कटाने के साथ पांच वर्ष के दरमियान निर्धारित प्रश्न न पूछने पर अगली बार चुनाव न लड़ने दिए जानी जैसी व्यवस्था को आश्रय देना होगा, तभी संसद का महत्व शायद संसदीय लोकतंत्र में सुरक्षित रह पाएगा, औऱ जनमहत्व के विषयों पर बात। साथ में नए लोगों को मौक़ा भी राजनीति में मिल पाएगा।

महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896