लघुकथा

इलेक्शन ड्यूटी

कभी-कभी हादसे-पर-हादसा हमें जाने कहां-कहां ले जाता है. अभी हाल में ही अमृतसर ट्रेन हादसे से हम अवाक रह गए थे. कल फिर त्रिपुरा इलेक्शन ड्यूटी के लिए छत्तीसगढ़ जा रहे 29 जवानों के घायल होने के हादसे के समाचार ने 40 साल पहले के एक हादसे में पहुंचा दिया. 
हम भी इलेक्शन ड्यूटी के लिए जा रहे थे. बस खचाखच भरी हुई थी. हमारे स्कूल की सब अध्यापिकाएं आ गई थीं, बस दो बहिनों कृष्णा और सुदर्शना का कोई पता नहीं था. पता लगता भी तो कैसे? उनके पड़ोस में कोई अध्यापिका रहती नहीं थी, कंप्यूटर थे नहीं और लैंडलाइन फोन उस समय इक्का-दुक्का लोगों के पास होते थे. और अधिक इंतज़ार नहीं किया जा सकता था, इसलिए बस चल पड़ी. 
इलेक्शन ड्यूटी पर आना जरूरी होता है, सो कृष्णा और सुदर्शना भी किसी तरह पहुंच गई थीं. शाम को ड्यूटी खत्म कर जैसे ही बस में चढ़े, कृष्णा और सुदर्शना की दुर्दशा देखकर रोना आ रहा था. दोनों के चेहरे पर चकत्ते, बाल बिखरे हुए, नाइट ड्रेस में ही वे इलेक्शन ड्यूटी पर आ गई थीं. मैंने इसका कारण पूछा-
”हमारी माताजी ने पालक का साग बनाया था. शायद साग के साथ कोई कड़वी और हानिकारक जड़ी भी कट गई थी. किसी से साग खाया ही नहीं जा रहा था. किसी ने दही के साथ रोटी खाई, किसी ने अचार के साथ.” कृष्णा ने रोते-रोते कहा.
”कृष्णा ने और मैंने थोड़ा-थोड़ा साग खाया था, पर माताजी ने साग व्यर्थ न जाए, इसलिए जबदस्ती सारा साग खाकर खत्म कर दिया. उनकी तो उसी समय इहलीला समाप्त हो गई थी.” सुदर्शना सुबकने लगी. 
”हमारे पूरे शरीर पर चकत्ते हो गए थे. इलेक्शन ड्यूटी के कारण हम न तो डॉक्टर के पास जा सकीं, न ही माताजी की अंत्येष्टि के लिए रुक सकीं.” कृष्णा ने कहा था.
”इलेक्शन ड्यूटी ने कृष्णा की भी बलि ले ली.” कुछ दिन बाद सुदर्शना ने ड्यूटी जॉइन की तो रोते हुए बताया था.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

One thought on “इलेक्शन ड्यूटी

  • लीला तिवानी

    सच में बहुत दुःखद किस्सा है, पर शत-प्रतिशत सच्चा है. उन दिनों वहां बिजली भी नहीं होती थी. हमने हाइ स्कूल तक की पढ़ाई लैंप की रोशनी में की है. साग ने नहीं, बल्कि उसके साथ अनजाने में कट गई जड़ी-बूटी ने जीवन-लीला समाप्त कर दी. उस समय हम बहुत ही छोटी उम्र के और नौकरी में नये-नये थे. डर भी बहुत था. उस समय संचार के साधन नहीं थे, उसके बावजूद हर काम में सावधानी बहुत जरूरी है. पकाने में और खाने में तो सावधानी ही काम आती है.
    आज समाचर पढ़ा- भिंड के नए कलेक्टर एस. धनराजू ने पहले ही दिन बड़ी कार्रवाई की है. स्वास्थ्य कारण बताकर चुनावी ड्यूटी से छुट्टी लेने वाले एक अधिकारी और एक अध्यापक को कलेक्टर ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी है. कलेक्टर ने इस संबंध में आदेश भी जारी कर दिए.

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