सामाजिक

कुंभ मेला : आस्था पर भारी आह…!!

एक डुबकी आस्था की, एक भाव सद्भाव का… एक समागम संतो का, एक भाव –
सद्बाव का…। अपने गृह जनपद प्रतापगढ़ से प्रयागराज की ओर जाते समय
रास्ते के दोनों ओर लगे इस आशय के होर्डिंग्स से कुंभ मेले की गहमागहमी
का इलाहाबाद पहुंचने से पहले ही मुझे भान होने लगा था। केवल यही नहीं
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी
आदित्यनाथ की तस्वीरों के साथ होर्डिंग्स पर लिखे कर्म ही उत्तर है …
का उद्घोष भाजपा और राज्य सरकार के इरादों का अहसास करा रहे थे।
प्रयागराज पहुंचने के दौरान कुंभ मेले 2019 से संबंधित सूचनाएं बांग्ला
समेत अन्य भारतीय भाषाओं में भी लिखी देख मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। मुझे
लगा कि वाकई इसकी प्रशंसा होनी चाहिए। क्योंकि कुंभ मेले में देश के
विभिन्न प्रांतों के लोग पहुंचेंगे। उनकी मातृभाषा में सूचनाएं होने से
उन्हें तो सुविधा होगी ही तीर्थ के बहाने भाषाई सद्भाव का उदाहरण भी
प्रस्तुत होगा। सिविल लाइन में बस से उतर कर हमने मेला स्थल तक पहुंचने
के विकल्पों की तलाश शुरू की तो पता चला कि सीधे संगम तक कोई वाहन नहीं
जा पाएगा। चुंगी में वाहन से उतर कर मेला प्रांगण तक हमें पैदल ही जाना
पड़ेगा। हमने ऐसा ही किया । सचमुच मेला स्थल का वातावरण काफी खुशनुमा और
स्वपनलोक जैसा था। भारी भीड़ के बीच चलते हुए हम आगे बढ़ रहे थे।
श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए चप्पे – चप्पे पर पुलिस तैनात थी।
तीर्थयात्रियों के हर सवाल का शालीनता और पेशेवर तरीके से जवाब देकर
पुलिस के जवान यूपी – बिहार पुलिस की चिरपरिचित छवि को तोड़ने का कार्य
बखूबी कर रहे थे। सहयात्रियों से पता चला कि मकर संक्रांति के दूसरे दिन
भीड़ कुछ कम है, लेकिन जल्द ही भीड़ बढ़ने लगेगी जो पूरे डेढ़ महीने तक
कायम रहेगी। परिवार के बाकी सदस्य कुंभ स्नान को संगम चले गए जबकि मैं एक
स्थान पर खड़े रह कर माल – आसबाब की रखवाली करने लगा। क्योंकि मुझे डर था
कि भीड़ का लाभ उठा कर उचक्के कहीं हाथ साफ न कर दे। हमारे पास समय कम था
क्योंकि महज दो घंटे बाद ही खड़गपुर आने के लिए हमें नंदन कानन एकसप्रेस
पकड़ना था। इसलिए मैं काफी बेचैन था। इस बीच सहयात्रियों और स्नान से
लौटे परिजनों से पता चला कि प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी
संगम में डूबकी लगाई है। खुद न सही लेकिन परिजनों के पुण्य स्नान की
तृप्ति मन में लिए मैं इलाहाबाद स्टेशन की ओर रवाना होने लगा। करीब चार
दशक बाद कुंभ से लौटने की बड़ी मनमोहक अनुभूति महसूस हो रही थी। मेले की
व्यवस्था का गहन आकलन करने के बाद मन सरकार व प्रशासन को 10 में 8 नंबर
देने को तैयार हो गया। लेकिन इस बीच एक घटना ने मुझे विचलित कर दिया।
क्योंकि भीड़भाड़ के बीच एक मासूम बच्ची रस्से पर संतुलन कायम करते हुए
करतब दिखा रही थी। पास मौजूद पालक लगातार बाजा बजाते जा रहे थे। जिस पर
बच्ची गजब के संतुलन का परिचय दे रही थी। ट्रेन पकड़ने की हड़बड़ाहट के
बीच इस घटना ने मेरे सारे उत्साह पर पानी फेर दिया। क्योंकि इसके पहले
अपने शहर में मैने कई बार ऐसी बच्चियों को बिलख – बिलख कर रोते देखा है।
जो शायद करतब दिखाने को तैयार नहीं, लेकिन उनके पालक जबरन उनसे ऐसा
करवाने पर आमादा थे। बच्ची दहाड़े मार कर रो रही थी। बेशक संगम के पास
करतब दिखा रही बच्ची बिल्कुल स्वाभाविक नजर आ रही थी। लेकिन इसी तरह की
पुरानी घटनाएं मुझे विचलित कर गई। मुझे लगा पता नहीं यह बच्ची किस मजबूरी
में ऐसा कर रही हो। बड़ी संख्या में पुलिस और वीआइपी के बीच कोई तो उस
बच्ची को ऐसा खतरनाक करतब दिखाने से रोकता। पुण्य लाभ के तमाम वाह – वाह
पर उस मासूम की आह मुझे भारी पड़ती नजर आ रही थी। ट्रेन पकड़ने की बेचैनी
और मन में भारी उधेड़बून लिए मैं परिजनों के साथ इलाहाबाद स्टेशन पहुंच
गया। यहां मेला स्थल से बिल्कुल विपरीत व्यवस्था नजर आई। सर्वाधिक व्यस्त
रहने वाले प्लेटफार्म संख्या पांच और छह पर यात्रियों की भारी भीड़ जमा
थी। जिनमें बड़ी संख्या में असहाय वृद्ध थे। जो दूर के प्रदेशों से कुंभ
स्नान को पहुंचे थे। उनके सामने भाषा की भी विकट समस्या थी। कहां तो
उम्मीद स्पेशल ट्रेनों की थी, लेकिन यहां तो नियमित ट्रेनें भी नदारद नजर
आई। क्योंकि वे विलंबित थी। मुझे लगा कि फिर उन विशेष ट्रेनों का क्या जिसका व्यापक प्रचार – प्रसार लंबे समय से किया जा रहा था।

— तारकेश कुमार ओझा

*तारकेश कुमार ओझा

लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं। तारकेश कुमार ओझा, भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 (नया) खड़गपुर (पश्चिम बंगाल) पिन : 721301 जिला पश्चिम मेदिनीपुर संपर्क : 09434453934 , 9635221463