कविता

तू जब शहर में होता है

तू जब शहर में होता है,
यह शहर भी अच्छा लगता है।
झूठे तेरे वादे झूठे,
फिर भी तू सच्चा लगता है।
करूंँ ठिठोली संग तेरे मैं,
यह मन बच्चा लगता है।
तू जब शहर में होता है,
यह शहर भी अच्छा लगता है
जब दूर तू मुझसे होता है,
यह मन बच्चों सा रोता है।
तू जब शहर में होता है,
यह शहर भी अच्छा लगता है।
ख्वाब- ख्वाब सा बचा नहीं,
अब ख्वाब भी सच्चा लगता है।
तू जब शहर में होता है,
यह शहर भी अच्छा लगता है।
धूप छाँव का कहर,चारों,
प्रहर भी अच्छा लगता है।
तू जब शहर में होता है,
यह शहर भी अच्छा लगता है।
साथ रहे हम,जिस पल,दोनों,
वह पल अपना लगता है।
दूर हुए जिस पल हम तुमसे
वो पल इक सपना लगता है।
दूरियों का यह कहर,
चारों प्रहर भी अच्छा लगता है।
तू जब शहर होता है,
यह शहर भी अच्छा लगता है।
तुम संग बीता हर पल,
एक लंबा सफर सा लगता है।
तू नटखट हर पल मुझको,
एक प्यारा बच्चा लगता है।
तू जब शहर में होता है,
यह शहर भी अच्छा लगता है।
— दीपक्रांति पांडेय