लघुकथा

गाँव और शहर

गाँव और शहर
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” अरे रमेश ! कहाँ जा रहे हो ? ”

” शहर जा रहा हूँ । यहाँ गाँव में रहा तो तुम्हारी तरह ऐसे ही दिन भर मिट्टी में सना रहना पड़ेगा । मिट्टी से परहेज नहीं मुझे भी , लेकिन क्या मिलता है इतनी मेहनत करके ? शहर की जिंदगी देखो ! सब ऐशोआराम के साथ आमदनी भी अधिक है । मैं तो कहता हूँ तू भी आ जा शहर में । मामा से कहकर तुझे भी कहीं न कहीं शहर में सेट करवा दूँगा। ”

” नहीं रमेश ! मैं शहर नहीं जाऊँगा ! यहीं रहकर खेती करूँगा । तू शहर जा ! मेहनत कर और देश की तरक्की में अपना सहयोग दे । मैं यहीं रहकर मेहनत करके तुम शहरवालों का पेट भरूँगा ।…… सोच ! अगर तेरी तरह सब शहर में ही बस जाएँगे तो शहर वालों का पेट कौन भरेगा ? शहर में चलनेवाले बड़े बड़े कारखाने अर्थव्यवस्था की चक्की तो चला सकते हैं लेकिन पेट में लगी आग को बुझाने के लिए तो रोटी ही चाहिए जो अनाज से बनती है और अनाज पैदा होता है खेतों में , गाँवों में ! ”

राजकुमार कांदु
मौलिक / स्वरचित

*राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।