कविता

दो जून की रोटी

सारा खेल है
दो जून की रोटी का
कोई दिन भर रहता परेशान है
तोड़ता है हाड़ अपने
इसको पाने की जुगत में
कोई होटलों में जाकर
बचा छोड़ देता है तश्तरी में इन्हें
फैंकने को कूड़ेदान में
देखो कैसा मुक्कदर है
आदमी का
कोई तरसता है इसे पाने को
कोई खाके दो कौर
छोड़ देता है यह कह कर
कि नहीं है स्वाद इसमें
हाय रे किस्मत उस बेचारे की
जो न देखता है स्वाद
न रूखा सूखा भात
बस खाता है बुझाने को
अपने उदर की आग
बीनते देखा है
फेकें हुए रोटी के टुकड़ों को
गोदी में लिए मासूमों के साथ माओं को
दो जून की रोटियों का
कुछ खेल ही ऐसा है

*ब्रजेश गुप्ता

मैं भारतीय स्टेट बैंक ,आगरा के प्रशासनिक कार्यालय से प्रबंधक के रूप में 2015 में रिटायर्ड हुआ हूं वर्तमान में पुष्पांजलि गार्डेनिया, सिकंदरा में रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा है कुछ माह से मैं अपने विचारों का संकलन कर रहा हूं M- 9917474020