कविता

फिर आया मधुमास

 प्यार का आया बसंत, खिल गए हैं दिग दिगंत|

 खेतों में सरसों की कलियां, लेकर आई फिर बसंत|

प्यार की चली फिर हवा ,आ गया मधुमास है|

 प्रकृति में अनुराग भरने, आया  बनकर आस है|

  मन के सोए ख्वाब  जागी, प्रीत की कलियां खिली|

वाटिका फूलों से भर गई, बसंती हवा चली|

 अब बसंती हवा देखो, प्रीत बनकर छा गई|

 अब मुझे तनहाइयों में, याद तेरी आ गई|

 कोपलें आने लगी है ,डालियों में फिर  नई|

 मन में फिर उन्माद  जागा, मिलन की आहट हुई |

  “रीत” के जीवन में फिर से, प्रीत की जगी आस है|

आस बन कर छा गया है, फिर से यह मधुमास है|

— रीता तिवारी “रीत”

रीता तिवारी "रीत"

शिक्षा : एमए समाजशास्त्र, बी एड ,सीटीईटी उत्तीर्ण संप्रति: अध्यापिका, स्वतंत्र लेखिका एवं कवयित्री मऊ, उत्तर प्रदेश