कविता

घुट रहा है बचपन अतुकांत

क्यों अंदर घुट रहा है बचपन
मासूम तड़पता बचपन
क्या कुसूर था बचपन का
कब खेलेगा बाहर बचपन ?

कब तक खेलें अंदर ही अंदर
उनको रहना नहीं है अंदर
उन्हें देखना है मैदान खुले
और देखना है फैला हुआ समंदर ।

विकास तभी व्यक्तित्व का होगा
बढ़ेगा ज्ञान ध्यान जिसमें उनका होगा
पढ़ाई के अलावा खुले में व्यायाम करना ,
कांति वाले चेहरे संग कायाकल्प ही होगा ।

भूलें कैसे वे बारिश के दिन
वो काग़ज़ की कश्ती चलाने के दिन
छपक – छपाक पानी में कूदें सब ,
साथी पर पानी उड़ाने के दिन ।

मम्मा ने अब तो समझाया है
बाहर तो कोरोना भयंकर आया है
है
कैसे छोड़ें हम इस ख़तरे में बोलो ,
करोड़ों को तो इसने खाया है ।

बच्चों को बच्चे ही रहने दो
घर में मन की कहने दो
हैं सुरक्षित सब ज़िद नहीं करते ,
ज्ञान गंगा अंदर बहने दो ।

पापा – मम्मा घोड़ा हैं बन जाते
दिल पहेलियों से हैं बहलाते
बचपन उनको याद है आता ,
वे अपने बचपन की कथाएँ सुनाते ।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति ‘