कविता

अक्षम्य अपराध

माता पिता और गुरु
पूजनीय हैं
देवी देवता तक ने
शीश नवाए
जो न करे इनका
मान व सम्मान
उसका अपराध अक्षम्य है
नवरात्रि के दिनों में
पूजीं जातीं हैं
मान कर देवी जो
उन्हीं नन्हीं मुन्नी
कली समान बच्चियों को
मसलता है जो
उसका अपराध अक्षम्य है
करे विश्वास तुम पर
आँख मूंद कर
उससे करे विश्वासघात
देकर धोखा जो
मानव रूप में है वो
किसी नीच सम
उसका अपराध अक्षम्य है

— नीलोफ़र नीरू 

नीलोफ़र नीलू

वरिष्ठ कवयित्री जनफद-देहरादून,उत्तराखण्ड