लघुकथा

रोशनी

सुबह-सुबह पुलिस संरक्षण में रह रही मोना को बताया गया- ”अपराधी सोहन पकड़ा गया है, उसने अपना गुनाह कुबूल कर लिया है, उसको जेल तो हो गई है, फांसी की सजा भी हो सकती है.”

मोना को यह समाचार सुनकर जितनी खुशी होनी चाहिए थी, उतनी नहीं हुई. उसका खुद का जीवन तो बरबाद हो ही गया था, उसके बाद अपराधी को जेल हो या फांसी लगे, उसका कलंक तो नहीं ही धुल सकता है न!

”उस दिन भी हमेशा की तरह मैं सोहन के घर ऑनलाइन क्लास अटैंड करने के लिए गई थी, हमारे पास इंटरनेट जो नहीं था!”वह विचार-वीथिका में गुम हो गई थी.

”शायद मेरी किस्मत ही खराब थी, कि उस दिन आंटी कहीं गई हुई थीं. मेरा मोहक रूप-रंग तो हमेशा ही उसके लिए आकर्षण का सबब होता ही था, उस पर पाशविकता का भूत भी सवार हो गया.” मोना की मायूसी मुखर हो गई थी.

”कितनी अच्छी जोड़ी होगी हमारी मोणा ते सोणा!” कमरे के दरवाजे की कुंडी लगाते हुए वह मेरी ओर झपटा था.” उसकी सोच भी सुन्न हो गई थी.

”बचाव के बहुत-से उपाय जानती थी, पर आस पास कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, मेरा बस न चल सका और वो हो गया था, जो नहीं होना चाहिए था.” वह माथा पकड़ कर बैठ गई, मानो घटना अभी-अभी हुई हो.

”किसको बताए, कैसे बताए! कुछ समझ नहीं आ रहा, आज रात को ही कोई जुगाड़ निकालकर दुनिया से विदाई ले लूंगी. अब तो अपनी परछाई से भी डर लगने लगा है!” उसका निर्णय दृढ़ था.

रात की प्रतीक्षा करते-करते उसने अखबार उठाकर पढ़ना चाहा.
अखबार उठाया तो अनमने मन से था, लेकिन अब वह शिद्दत से पढ़ रही थी- ”अंतिम संस्कार को भी मुश्किल बना रही ‘मौताणा’.” मौत का तो पता था, पर ये ‘मौताणा’. क्या है!” वह पढ़ती गई, ”पति की गोली से पत्नि की मौत, पुलिस ने दस लाख रुपये में मौताणा समझौता कराया, तब जाकर मृतका का अंतिम संस्कार हो पाया.” चार लाख, छः लाख, आठ लाख! मैं मरी तो इतनी राशि कहां से लाएंगे पिताजी? मौत पर भी मोल-भाव!” और भी न जाने वह क्या-क्या सोच गई.

”मां आज मेरे साथ ऐसा हो गया है, मैं पुलिस में रिपोर्ट करना चाहती हूं और पुलिस संरक्षण में रहना चाहती हूं. मर भी नहीं सकती, मरूंगी तो आप लोगों को मौताणा देना पड़ेगा. जीती हूं तो वह और उसके साथी कुछ-कुछ करते ही रहेंगे.”

बेटी के दृढ़ निश्चय पर माता-पिता को नाज था और आज अपराधी, वह उसका नाम भी नहीं लेना चाहती थी, जेल में है.

”बहुत दिनों बाद उसने आइने में अपनी सूरत देखी थी.” निडरता का ओजस उसके चेहरे पर नमूदार था.

अपनी परछाई से भी डरने वाली मोना अब सबको कहेगी- ”परछाई से कभी मत डरिये, उसकी उपस्थिति का अर्थ है कि आस-पास कहीं रोशनी है.”
उसने रोशनी का दीदार जो कर लिया था.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244