लघुकथा

गवाही

साहित्य- सम्पदा ; हमारी लघुकथाएं मंच पर विजेता लघुकथा

सुलेखा को सम्मान पर सम्मान, उपाधि पर उपाधि मिलती जा रही थी. आज भी उसे उपन्यास “जीवन-रेखा” पर प्रकाशक की ओर से “साल का सर्वश्रेष्ठ लेखक” होने का सम्मान मिला था. मां सरस्वती की कांस्य-प्रतिमा और शॉल से सम्मानित किए जाने के साथ ही 51 हजार रुपये का सांकेतिक पुरस्कार भी उसे दिया गया था.
सम्मान से सम्मानित होकर वापिस आते हुए उसे बीते साल की त्रासदी की याद कैसे न आती!
दो साल पहले अकस्मात कोरोना का फंदा सबकी जान का बवाल बन गया था. सुलेखा पर इसका असर नहीं के बराबर हुआ. अपने लेखन के जरिए वह बराबर अकेलेपन को एकांतवास की संज्ञा देकर सबको ढाढ़स बंधाती रही, पर न जाने क्यों बहुत कोशिश करने पर भी वह स्वयं अकेलेपन के दंश से नहीं उबर सकी.
यों तो होने को कुछ ख़ास हुआ भी नहीं था! हर समय रसोईघर में चलने वाला रेडियो अचानक शांत हो गया था, गैस के चूल्हे धीमे हो गए थे, छोटे-बड़े कुकर की सीटियां नाराज हो गई थीं. सब कुछ गड्डमड्ड हो गया था! लेखन-जगत की चहेती सुलेखा अचानक लेखन से विमुख हो गई थी. बस मन अशांत हो गया, तन विकल हो गया, नींद रूठ गई, फंस गई वह अवसाद के घेरे में. इसी अवसाद ने उसे अस्पताल में पहुंचा दिया था.
शुक्र यह हुआ कि अस्पताल में उसे मिले असीम धैर्य से धनवान बेहतरीन चिकित्सक और बाकी सबसे भी मिला अपार स्नेह और सहयोग!
ठीक भी होने लगी वह, लेकिन उसे लगता कि वह पिछला सब भूल चुकी है. डॉक्टर उसे बराबर लेखन की ओर उन्मुख करना चाहते थे, पर उसे लगता था कि बुद्धि की तरह उसकी लेखनी भी कुंद पड़ गई है और अब वह कभी लिख ही नहीं पाएगी! स्मृति-भ्रंश से वह ख़ासी चिंतित थी.
“मम्मी जी, आपको याद है प्रौमिला आंटी का किस्सा! आपने ही मुझे बताया था. अवसाद के कारण वे सब कुछ भूल चुकी थीं, लेकिन पहले की तरह पूरा सुंदरकांड उन्हें अच्छी तरह याद था! बाद में धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया था. मम्मी जी, आप भी अपनी स्मृति को टटोलें, कहीं तो कुछ बचा होगा! मम्मी, प्लीज़ आप फिर से कुछ लिखना शुरु कीजिए. डॉक्टर्स की पुख्ता राय है कि यही आपकी सबसे कारगर दवाई है.”
उस दिन से बिटिया ने जबरन जो लैपटॉप पकड़ाया था, वह फिर छूटा ही नहीं, उसी का सुपरिणाम था- आज का सम्मान समारोह!
“कहां खोई हुई हैं मैडम जी, घर आ गया है, कार से उतरिए.” पतिदेव की आवाज से उसकी तंद्रा भंग हुई.
“केवल घर ही नहीं, लेखन में भी उसकी वापसी हो चुकी थी.” उसके मन ने गवाही दी.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244