कविता

गौमाता की चीख

 

बहुत दुःख होता है

जब आज हमारी गौमाता

बेशर्म राजनीति का मोहरा बन

इधर उधर धक्के खा रही है,

जान देकर भी सूकून नहीं पा रही है,

खून हत्या माबलिंचिग का

आरोप रोज रोज सह रही है।

धर्म और धर्मांता के खेल में

फुटबॉल बन ठोकरें खा रही हैं।

जितना पूज्य  है, उतना ही हलाल होकर

इंसानों का आहार बनती जा रही है।

हिंदू मुसलमान की चक्की में रोज रोज बीच पिस रही है

हमको इसकी चीख सुनाई नहीं दे रही है,

राजनीति के शोर में गौमाता की चीख

दबकर दम तोड़ रही है।

आज गौमाता हम सब से कह रही है

अपनी सुरक्षा का हमसे आवाहन कर रही है,

हिंदू मुसलमान की पहचान मैं तो नहीं करती

सब मेरे बच्चे हैं मैं सबको अपना ही समझती  हूँ

अपने बच्चों से तो कोई मां नहीं डरती

पर ये दुर्भाग्य मेरा है

जो अपने बच्चों से ही डर डर कर जी रही हूँ।

यदि मुझसे तुम सबको इतनी ही परेशानी है

भाई ही भाई का जब कत्ल करने पर तुला है

तो मेरे अस्तित्व को एक झटके से मिटा दो

टुकड़ों टुकड़ों में तो रोज मर रही हूँ

अच्छा है सब मिलकर एक बार में ही

धरती से मेरा नामोनिशान मिटा दो।

माता कहकर अब और अपमान न करो

मेरे लिए कानून तो बना नहीं सकते

राजनीतिक फायदे के लिए मुझे मरने भी नहीं देते।

बहुत हो चुका अब मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो

स्वार्थी धर्म और धर्मांता की आड़ में मरने कटने दो

गाय हमारी माता है का प्रलाप अब बंद करो

तुम सब अपनी अपनी खुलकर राजनीति करो

निहित स्वार्थ में अपना जमीर तो बेंच ही चुके हो

कम से कम मुझे तो अब बक्श दो।

 

 

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921