धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

हिन्दु धर्म तभी बच सकता है जब हिन्दु वेदों के साथ जुड़ें

स्वामी दयानन्द ने अपने समय में हिन्दुओं की हालत को देखते हुए नारा दिया था, फिर से वेदों की तरफ जाओ जिसका अर्थ यही था कि वेदों को पढ़ो, समझो और दूसरों को भी समझााओ। आज जो मैने हिन्दु धर्म की हालत देखी है उस को देखते हुए तो स्वामी जी की यह बात बहुत सही लगती है।
मैं और मेरे पति अभी हाल में आसाम घ्ूामन के लिए गए थे। इसी दोरान हमने गुहाटी का कामख्या मन्दिर देखा। बहुत सी बातें मन का दुखी करने वाली थी। पहली थी कि देवी के आगे पषुओं की खुले आम बली दी जाती है । यह काम वहां पुजारी ही करते हैं फिर जो चाहते हैं उनको बली दिय हुए पषु का मांस छोट छोटे टुकड़ों में काट कर प्रषाद के रूप में दिया जाता है। बली दिए हुए पषु की छाल अलग कर काटने का काम भी मन्दिर में ही किया जाता है। आप उन को पुजारी कहेंगे या बुचड़। बली देने वाले और प्रषाद लेने वालों की लाईन लगी हुई थी।
दूसरी दुख देने वाली बात यह थी कि वहां पार्वती की योनी की पूजा की जाती र्है। जब पूछा कि योनी की पूजा का क्या तुक है तो उसका उतर था कि जो तर्क षिव लिंग की पूजा का है वही तर्क पार्वती की योनी की पूजा का है। महर्शि दयानन्द का हिन्दु जाति पर बहुत बड़ा उपकार है कि पहली बार कोई ऐसा व्यक्ति आया जिसने पौराणिक पंिडतों द्वारा स्थापित इन सभी गलत कुरितियों के विरूद्ध आवाज उठाई। यह सिलसिला स्वामी श्रद्वानन्द के समय तक चलता रहा उस के बाद आर्य समाज भी कर्मकाण्ड की धारा में वह गया। हां यह हमारा अच्छा भाग्य है कि आर्य समाज अभी भी इन गलत कुरितियों से बचा हुआ है। यह कब तक चलता है यह तो कहना मुष्किल है क्योंकि न तो हम आपने बच्चों को आर्य समाज लातें हैं और ना ही उनकों अपने पास बिठा के वेद की मान्यताओं के बारे में बतातें हैं। न ही हमें यह परवाह है कि वह आर्य समाज से अलग हो कर किस तरफ जा रहें हैं
षायद आप ने भी यू टयूव पर बहुत से उन महिलाओं को सुना होगा जो कि हिन्दु धर्म को छोड़कर ईसलाम को अपना लेती हैं। अािकतर का कहना होता है कि हमें ईसलाम में आने के बाद कुरान व ईसलाम की दूसरी पुस्तकें पढ़ने के बाद ही पता लगा कि धर्म क्या चीज है और धर्म द्वारा कैसे अपने जीवन को सुधारा जा सकता है। चाहे आप कुछ भी कहें परन्तु 90 प्रतिषत हम हिन्दंओं के बच्चे यह नहीं बता सकते कि हिन्दु धर्म है क्या और हिन्दु धर्म की कोन सी ऐसी चीज है जो उनको गर्वित महसूस करवाती है। कारण हम हिन्दु माता पिता षायद ही बच्चों के साथ बैठकर कभी धर्म के बारे में चर्चा करते है। हम त्योहार तो मनाते हैं पर उन में कर्मकाण्ड और घ्टिया मनोरंजन के सिवा कुछ नहीं होता। यहां तक कि हमारे घरों में जो इकठठे होकर आरती करते थे उसकी प्रथा भी खत्म हो गई है जैसे कि हम आर्य समाजियों के घरों में संध्या करने की प्रथा खत्म हो गई है। धर्म तो वह है जो हमारे इस जीवन को और अगले जन्म को भी अच्छा बनाए। अर्थात हमारे द्वारा किए कर्मो को सुधारे। सत्य को अपनाए व असत्य को त्यांगे यह धर्म की बात है क्यों यह हमारे व्यवहार व कर्म को अच्छा बनाती है और मन को षान्ति देती है। हिन्दु धर्म नहीं है परन्तु वेदों की कही बातों पर अधारित धर्म जिसे हम सत्य सनातन वैदिक धर्म कह सकते है, हीं धर्म है। बात वेदों की कही बातों को समझने की है व जीवन में धारण करने की परन्तु यहां भी हमें स्वार्थी पण्डितों ने भाशा में उलझा दिया। संसकृत चाहे कितनी भी अच्छी भाशा है परन्तु आज के समय में जब बच्चे अपने कैरियर की रेस में उलझे हुए हैं, चाहे लड़का हो या लड़की, उनके पास संसकृत पड़ने का समय नहीं। गायत्री मन्त्र या प्रार्थाना मन्त्रों को बोलने का तभी फायदा है जब कि उनके अर्थ को समझ क्र जीवन में धारण किया जाए। तो बजाए इसके कि हम अपने बच्चों से यह अपेक्षा करें कि वर संसकृत का ज्ञान प्राप्त कर वेदों के मन्त्रों के अर्थो को जाने। क्यों नही ंहम उन वेदों की मान्यताओं को सरल लोगों की भाशा में ही प्रस्तुत कर देते।

— नीला सूद 

नीला सूद

आर्यसमाज से प्रभावित विचारधारा। लिखने-पढ़ने का शौक है।