गीत/नवगीत

कर्म फल

आखिर जिसके, पास जो है वह वही तो, बांट पाएगा
यदि बोया पेड़, बबूल का तो फिर फल, कहां से, खाएगा।।

अपनी ही धुन में, हम ऐंठें रहते मीठे बोल ज़रा, कम ही कहते
सदविचारों को, नजरंदाज करते फिर पाप का बोझ, ही बढ़ाएगा।

यदि बोया पेड़, बबूल का तो फिर फल, कहां से, खाएगा।।

लालच और , वैमनस्यता ने घेरा जीवन में, छा गया अंधेरा
अब जाकर कुछ, ज्ञान उपजा है क्या इतने से, काम चल पाएगा।

यदि बोया पेड़, बबूल का तो फिर फल, कहां से, खाएगा ।।

उच्च विचारों की, उपेक्षा करते नकारात्मकता, शीघ्र ग्रहण करते
बाद में तो केवल, हाथ ही मलेंगे कसौटी पर न,खरा उतर पाएगा।।

यदि बोया पेड़, बबूल का तो फिर फल, कहां से, खाएगा।।

ईश कृपा तो, सब पर बरसी हम ही कर बैठे, नासमझी
अब पछताने से, क्या हासिल गया समय तो, न हाथ आएगा।।

यदि बोया पेड़, बबूल का तो फिर फल, कहां से, खाएगा।।

मोह माया का, सब खेल निराला कदम-कदम पर,यहां गड़बड़झाला
अपनी मर्ज़ी यहां,कम ही चलती है कब तक अपना दम, भरपाए गा।

यदि बोया पेड़, बबूल का तो फिर फल, कहां से, खाएगा।।

जानबूझकर, गलत ढंग अपनाए सिद्धांतों से भटके,बाद में पछताए
अपनी संस्कृति,संस्कारों को छोड़ा जड़ से बिखर, कैसे जुड़ पाएगा।

यदि बोया पेड़, बबूल का तो फिर फल, कहां से, खाएगा।।

भाग दौड़ में, कुछ ऐसे फंस गये पता न चला, कितने वर्ष गुजर गये
अब चला चली, की इस बेला में भवसागर कैसे, तर पाएगा ।।

यदि बोया पेड़, बबूल का तो फिर फल, कहां से, खाएगा।।

सब पर ऊपरवाले, की नजर है जानकर भी हम, क्यों बेखबर हैं
कर्म फल से भला, कौन बच पाया तू भी ऐसे, कैसे बच पाएगा।।

यदि बोया पेड़, बबूल का तो फिर फल, कहां से, खाएगा ।।

— नवल अग्रवाल

नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई