संस्मरण

अविस्मरणीय बरसात

  मैंने शासकीय महाविद्यालय गुना में बीएससी प्रथम वर्ष में 1976 में प्रवेश लिया था।चूंकि मैं छोटी जगह से ज़िला मुख्यालय पर पहुंचा था,तो काफी डरा हुआ था ,और संकोच में भी था।पर मैं पढ़ाई में बहुत अच्छा था,और अच्छे संस्कारों में पला था इसलिए मुझमें एक आत्मविश्वास भी था।

    महाविद्यालय में प्रवेश होने के बाद मैं पैदल ही महाविद्यालय जाने लगा। उन दिनों स्कूटर/मोटर साइकिल की तो बात छोड़ ही दीजिए साइकिल से भी बहुत कम लोग महाविद्यालय जाते थे।यहां तक कि बहुत सारे प्राध्यापक भी पैदल ही महाविद्यालय जाते थे।

 जब मैं जुलाई में महाविद्यालय पढ़ने जाने लगा, तो बरसात शुरू हो गई। तो मैं छाता लेकर महाविद्यालय जाने लगा। ऐसे ही एक दिन मैं महाविद्यालय जा रहा था कि पानी बरसना शुरु हो गया,तो मैंने छाता खोल लिया। तभी मैंने देखा कि हमें केमिस्ट्री पढ़ाने वाले पटेल साब भीगते हुए जा रहे हैं,उनके पास छाता नहीं था,तो मैंने उन्हें अपने छाते में आने के लिए कहा, पर उन्होंने संकोचवश मना कर दिया। पर मुझे यह अच्छा नहीं लगा कि गुरू भीगते हुए जाएं और शिष्य छाते में। इस पर  मैंने उनसे निवेदन किया कि सर आप छाता ले लीजिए, मैं तो ऐसे ही ठीक हूं। पर इस प्रस्ताव को भी उन्होंने अस्वीकार कर दिया।

    तो मैं बहुत ही पशोपेश में पड़ गया कि मैं छाते में जाऊँ,और गुरू बिना छाते के।यह भी सही नहीं। फलस्वरूप मैंने अपना  छाता बंद किया और मैं भी भीगता हुआ चलने लगा।तो उन्होंने मुझे छाता लगाने के लिए कहा,मैं नहीं माना तो उन्होंने बहुत समझाया पर मैं नहीं माना।अंततः वे और मैं दोनों ही भीगते हुए महाविद्यालय पहुंचे।

  वहां पहुंचकर सर ने मुझे स्नेह से देखा और बस इतना ही कहा कि बेटे तुम में जो संस्कार हैं वे तुम्हें बहुत ऊँचाई तक ले जाएंगे। आज मैं महाविद्यालय में स्वयं प्राध्यापक (अब प्राचार्य)हूं। सोचता हूं कि पटेल साब के उसी आशीर्वाद की बदौलत ही हूं। उस दिन की अविस्मरणीय बरसात को मैं कभी भी नहीं भूल सकता हूं।

  –प्रो (डॉ) शरद नारायण खरे

*प्रो. शरद नारायण खरे

प्राध्यापक व अध्यक्ष इतिहास विभाग शासकीय जे.एम.सी. महिला महाविद्यालय मंडला (म.प्र.)-481661 (मो. 9435484382 / 7049456500) ई-मेल-khare.sharadnarayan@gmail.com