सामाजिक

पता है फिर भी? अरे क्यों ? 

पता है फिर भी? अरे क्यों? फिर भी क्यों?  आखिर क्या मिल रहा या क्या मिलेगा? क्या इसमें तुम्हारा बहुत बड़ा फायदा है? बताओ अरे बताओ मैंने कुछ पूछा है समाज के उन लोगों से जो? बोलते हुए भी या सवाल पूछते हुए भी सिर्फ घृणा व गुस्से से भरा मेरा मन मेरे भीतर पनप रहे गुस्से की ज्वाला को ओर अधिक सुलगा रहा है। मैं तो सिर्फ समाज को देख, समझ कर लिखते हुए अपनी कलम चलाते हुए जब इतनी आक्रोश या कह लो गुस्से मे भर रही तो जरा उनका सोचो जिनके जीवन में सच ये घटना घटित हो रही है। क्या हाल हो रहा होगा उनका आखिर सोच-सोच कर इन परिस्थितियों से जुझने वालों के मन कि पीड़ा मेरी कलम रुह से महसूस कर रही है। कितनी उनके अंदर करुणा, दर्द, चीख वो चीख भरी दर्द से जो आपको बाहरी तौर पर दिख नहीं रही पर सामने वाला चीख रहा है भीतर ही भीतर दर्द की आग में। शायद आप जानते हैं, पहचानते भी हैं फिर भी? क्या मिलेगा? बताओ आज मेरी कलम आवाज़ उठा रही है? बताओ, बोलो ना? 

उफ्फ़ मेरे इतने ही शब्द पढ़कर आप पाठकों की रुह छलनी हो ही गयी होगी और आप यही सोच रहे होंगे कि भाई हमनें ऐसा क्या कर दिया की लेखिका की कलम इतना दर्द में भरकर सवाल, ऊंगली उठा रही समाज में व्याप्त कुछ लोगों के आंतरिक दर्द-चीख को जानकर, पहचान कर महसूस कर वो भी दूसरों का दर्द? 

जहॉं एक तरफ़ मैंने आप पाठकों से सवाल किये वहीं दूसरी ओर से आप पाठक मेरे लिये खुद के भीतर सवालों का अथाह सागर लिए सोच रहे की क्यों लेखिका की कलम आज आक्रोश मे है? तो चलिये आज बता देती हूॅं कि लेखिका वीना की कलम क्यों आक्रोश में है और कलम समाज में बढ़ती किस समस्या पर आज अपना गुस्सा फोड़ रही वो भी धनुष समान कलम से, शब्दों के तीखे-तीखे बाण छोड़कर जो सीधे से पाठक का सीना छलनी-छलनी कर दे। 

दरअसल मैं बात अरे-अरे मैं नहीं मैं कौन होती किसी पर ऊंगली या सवाल उठाने वाली मैं तो तुच्छ सी एक छोटी सी लेखिका हूॅं भला मुझे कहॉं अधिकार किसी से सवाल करने का ये तो जो मेरी कलम है ना ये चुप रह ही नहीं सकती बस कोई सवाल मेरे मन में उठा नहीं की उगल देती लिख-लिख कर मेरे भीतर की बातों को और पाठक बेवजह मुझे ही दोष देते। क्या कहूं भाई आप पाठकों को– मेरी कलम ही कान की कच्ची है

बस कोई बात या कोई प्रश्न मुझमें मतलब मेरे भीतर उठने की देर है, यहॉं सवाल उठा नहीं की मेरी कलम धड़-धड़-धड़-धड़ कर रेल के माफिक चलती ही रहती है रूकने का नाम ही नहीं लेती रुकती तब जब मेरा मन शान्त हो जाता पूरी तरह। 

अरे! लो फिर मैं भटक गई कि हम या लेखिका की कलम क्यों गुस्से में है। दरअसल लेखिका इसलिए गुस्से से भरी है की ये समाज में आखिर क्या हो रहा है? समाज में ये तो नाइंसाफी हो रही उस इंसान के साथ जो रुह लिये फिर रहा, बहुत सच्चा, सरल, ईमानदार, हंसमुख, सभी को अपना समझने वाला, सभी का सम्मान करने वाला और उसी के साथ? छल! 

चलिए बताती हूॅं कि आज किस विषय को लेकर कलम चलाई, किसने किसके साथ छल किया। दरअसल ये छल उस व्यक्ति ने किया जो धोखेबाज़, फरेबी है जो बहुत ही चालाकियों से एक सरल इंसान को छलता ही चला जा रहा है और उसे कानों कान खबर भी नहीं लगने दे रहा है मतलब इतनी सफाई से छल रहा कि सामने वाला समझ भी नहीं पा रहा कि उसके साथ छल हो रहा है। जब छलिये की कुछ संदिग्ध कार्यों पर या कह लें की अलग ही प्रकार का आभास हुआ सरल इंसान को और उसने कुछ सवाल जवाब किए तो उसे अपने ही परिचितों के बीच पागल घोषित करने की कोशिश की, उसे इस तरह जाल बिछा फंसाने की कोशिश की ताकि उस शातिर छलिये को सब सरल और सरल व्यक्ति को शातिर समझे और पूरा का पूरा अपना हर एक गुनाह जानकर भी कि वो स्वयं गुनहगार है सरल इंसान पर मढ़ देता। जानकर भी अनजान बन किसी के साथ किया छल उस समय सोचे वो तो दुनिया उसके रवैए से अनजान है परंतु जो साथ में रह रहा वो धीरे-धीरे सब जान जाता और जब वो आवाज़ उठाता तो उसे इस तरह मानसिक प्रताड़ना दे अपने गुनाहों को कम करने कि जगह वो और भी अधिक बढ़ा लेता। 

खैर वो कहावत तो आपने सुनी होगी *बकरे की मॉं कब तक खैर मनाएगी* ठीक उसी तरह कब तक आखिर गुनाहगार अपने द्वारा किए गए गुनाह दूसरों पर थोप सकता है। एक ना एक दिन तो उसके हर एक अपने, परायों, दोस्तों, या अन्य जगह किये गये कुकर्मों से बच सकता है। एक ना एक दिन तो चेहरे पर लगा नकाब उतर एक बदनुमा चेहरा समाज के सामने आ ही जाता है। वो चेहरा जो कालिख पोतने के भी लायक नहीं है। जानते हुए भी गुनहगार कि वो स्वयं गुनहगार है फिर भी सरल को छलता है आखिर क्यों और कब तक? 

 गुनहगार सोचता किसी ने नहीं देखा परंतु वो समय, कर्म, और भगवान को भूल गया कुकर्म करते वक्त ये तीनों अदृश्य हैं हम आम मानव की दृष्टि से परंतु ये तीनों जब अपना सुदर्शन चक्र चलाते तो क्या राजा क्या रंक सब गुनहगार चपेट में आते। अर्थात कर्म ऐसे करो कि जग तेरा नाम गाए, तू चला जा दुनिया से चाहे, तेरे नाम की गूंज रह जाए। 

— वीना तन्वी 

वीना आडवाणी तन्वी

गृहिणी साझा पुस्तक..Parents our life Memory लाकडाऊन के सकारात्मक प्रभाव दर्द-ए शायरा अवार्ड महफिल के सितारे त्रिवेणी काव्य शायरा अवार्ड प्रादेशिक समाचार पत्र 2020 का व्दितीय अवार्ड सर्वश्रेष्ठ रचनाकार अवार्ड भारतीय अखिल साहित्यिक हिन्दी संस्था मे हो रही प्रतियोगिता मे लगातार सात बार प्रथम स्थान प्राप्त।। आदि कई उपलबधियों से सम्मानित