वो पागल लड़की
कश्मीर की वादियों में बसा एक छोटा-सा गांव, जहां झील की सतह पर उतरती चांदनी और पहाड़ों की खामोशी में मोहब्बत की कहानियां गूंजती थीं। इसी गांव में जन्मी थी ज़रीन,एक खूबसूरत, मासूम और सुरों से भरी लड़की, जिसकी आवाज़ में कश्मीर की हवाओं की मिठास थी। बचपन से उसका साथी था आरिफ, जो उसकी हर ख़ुशी और हर दर्द का हमराज़ था। दोनों की दोस्ती कब मोहब्बत में बदल गई, किसी को पता ही नहीं चला।
झील के किनारे, चिनार के पेड़ों के नीचे, ज़रीन ने आरिफ़ से पूछा था,
अगर मैं कहीं खो जाऊं, तो क्या मुझे ढूंढ लोगे?”
आरिफ़ मुस्कराया था, “तुम मेरी सांसों में हो, तुम्हें कैसे खो सकता हूं?”
उनकी मोहब्बत गांव की गलियों, झील की लहरों और हवाओं में गूंजती थी।
एक दिन, ज़रीन के साथ हुई एक घटना ने सब बदल दिया। आरिफ़ ने उसकी हिफाज़त में एक युवक को बहुत मारा, जिससे गांव में हलचल मच गई। उसी रात, समाज के डर और बदनामी के साए में, दोनों गांव छोड़कर बंबई की ओर निकल पड़े।
स्टेशन पर विदा लेते वक्त ज़रीन की आंखों में आंसू थे— क्या हम कभी लौट पाएंगे?”
आरिफ ने उसका हाथ थामा, “जहां तुम हो, वही मेरा घर है।”
बंबई पहुंचकर, आरिफ़ ने ज़रीन को उसकी गायकी के लिए मौक़ा दिलाने की कोशिश की। एक पुराने परिचित सलीम ने उन्हें पनाह दी। ज़रीन की आवाज़ ने जादू बिखेरा—फिल्मों में गाने का मौका मिलने लगा।
लेकिन शोहरत के साथ ज़रीन की व्यस्तता बढ़ती गई। आरिफ ख़ुद को अकेला महसूस करने लगा। ज़रीन के सह-गायक किशोर के साथ उसका वक्त ज़्यादा गुजरने लगा, जिससे आरिफ़ के मन में शक और दूरी पनपने लगी।
एक शाम, ज़रीन ने आरिफ़ को ख़ामोश पाया— “क्या हुआ?”
“शहर की भीड़ में ख़ुद को खोता जा रहा हूं, ज़रीन। यहां सब कुछ है, बस हमारी वो हंसी नहीं।”
“तुम्हारे बिना सब अधूरा है, आरिफ। ये शोहरत तुम्हें नहीं छीन सकती मुझसे।”
“कभी-कभी लगता है, ये शहर हमें निगल जाएगा।”
किशोर की नज़दीकियों ने आरिफ़ के मन में ग़लत फ़हमियां पैदा कर दीं। एक रात, झगड़े के बाद आरिफ़ बिना बताए गांव लौट गया—टूटा हुआ, शराब में डूबा, फटेहाल।
गांव लौटकर, मोहब्बत की यादें और जुदाई का दर्द आरिफ़ को तोड़ गया। एक रात, ज़रीन के ग़म में उसने इतनी शराब पी कि उसकी जान चली गई।
कुछ दिन बाद, ज़रीन आरिफ़ को ढूंढते-ढूंढते गांव पहुंची। जब उसे उसकी मौत का पता चला, तो उसकी दुनिया उजड़ गई। सदमे में उसकी दिमाग़ी हालत बिगड़ गई—वो पागल हो गई।
अब गांव में लोग उसे एक पागल लड़की के नाम से जानते थे। वह दिन भर गलियों में घूमती, गाना गाती ,फ़िरती रहती।
कभी मोहब्बत की तड़प, कभी जुदाई का दर्द, कभी पागलपन की हदें उसकी आवाज़ में घुली होतीं।
बच्चे और मनचले उस पर पत्थर फेंकते, वह भागती-भागती क़ब्र के पास आ जाती।
शाम को ,भी उसी क़ब्र से लिपटकर सो जाती, सुबह फ़िर गांव में गाती-घूमती नज़र आती।
एक दिन, क़ब्र से लिपटकर ज़रीन गा रही थी, “तेरे बिना ये हवाएं भी अजनबी हैं…”
उसकी आवाज़ में दर्द और मोहब्बत घुल गई थी। गांव के लोग दूर से देखते, किसी की आंखें भीग जातीं।
एक दिन गांव में एक बड़ी, चमचमाती कार आई। उसमें से कुछ शहरी लोग उतरे, जो सीधा उस क़ब्र के पास गए और ज़रीन को जबरदस्ती कार में बिठाकर ले गए। गांव में अफ़वाहें फैल गईं,किसी को नहीं पता था कि वे लोग कौन थे, या ज़रीन को कहां ले गए।
समय बीतता गया। कभी-कभी वही कार फ़िर गांव आती, मुखिया के घर रुकती, और फ़िर मुखिया के साथ क़ब्र पर जाती। क़ब्र अब पक्की बन चुकी थी, वहां फ़ूल, अगरबत्तियां और रंग-बिरंगी बत्तियां लगाई जातीं। गांव के लोग दूर से यह सब देखते, लेकिन कोई कुछ नहीं जानता था।
एक दिन मुखिया के नौकर ने चुपचाप बताया कि वह ख़ूबसूरत लड़की, जो हर बार कार से आती है, वही पागल लड़की—ज़रीन—है। किशोर, जो उसका सह-गायक था, अब उसे अपनी मुंहबोली बहन मानता है। किशोर ने ही शहर ले जाकर उसका इलाज़ करवाया, जिससे ज़रीन की मानसिक हालत अब पूरी तरह ठीक हो चुकी है।
अब ज़रीन न तो पागल है, न बेसहारा। वह अपने भाई जैसे किशोर के साथ गांव आती है, आरिफ़ की क़ब्र पर फ़ूल चढ़ाती है, उसकी याद में दुआ करती है। गांव में लोग अब भी उसे दूर से देखते हैं, लेकिन उसकी आंखों में अब स्थिरता और गहराई है,वो आज भी किसी की जीवनसंगिनी नहीं बनी, आज भी कुँवारी है।
ज़रीन की कहानी अब सिर्फ़ दर्द और जुदाई की मिसाल नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बातों की गहराई और वफ़ादारी की मिसाल बन गई है—एक ऐसी मोहब्बत, जो वक्त और हालात के बावजूद अपने वजूद में कायम रही।
कश्मीर की वादियों में आज भी उसकी तन्हा आवाज़ हवाओं में गूंजती है, और उसकी मोहब्बत की दास्तां हर दिल को छू जाती है।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह
