मन विकल
सघन तम में क्यों मन विकल,
नयन सूखते कभी सजल,
निज उर की थाह न पाती,
अंजन मसि से लिखूँ मैं पाती।
तुम मुझ में और मैं हूँ तुममें,
ज्यों कृष्ण राधामय राधा कृष्ण मय,
क्यों पल-पल अब यह समझाती,
हम तो ठहरे एक दूजे के थाती,
अंजन मसि से लिखूँ मैं पाती।
सोहे ना तनिक कर्णफूल,
श्रृंगार लागे है जैसे शूल,
मोम से बँधी हुई एक बाती,
उष्मा से तेरे ही पिघल जाती,
अंजन मसि से लिखूं मैं पाती।
हर आहट से चौंक पडूँ,
कभी भागूँ कभी लौट पडूँ,
कुंतल काली मुझे भरमाती,
अठखेलियां इसकी तनिक न भाती,
आनन को मेरे है तड़पाती,
अंजन मसि से लिखूँ मैं पाती।
— सविता सिंह मीरा
