गीतिका/ग़ज़ल

तराने बदल गये

अल्फाज छूटे जीवन के माने बदल गये
जलती हुयी शम्मा के तराने बदल गये

जीवन सारा जंग का मैदान लग रहा
हर दयार उनको अब शमशान लग रहा
दर्द की जागीर के हैं मालिक बने हुए
यहाँ राग छेड़ने वालों के गाने बदल गये

दहलीज फ़ना क्या हुयी दीवार लाँघते हैं
आरी चला के दरख़्त से बहार मांगते हैं
नजर उनकी राह टटोलती ही रह गयी
इस “राज” के सारे जमाने बदल गये

थी आरजू जिसकी वो मुकाम न मिला
पता यहाँ मिला पर मकान न मिला
खूब यहाँ मोड़ मिले वो मुड़ते चले गये
ठोकरें मिलने लगी तो बहाने बदल गये

राज कुमार तिवारी “राज”

राज कुमार तिवारी 'राज'

हिंदी से स्नातक एवं शिक्षा शास्त्र से परास्नातक , कविता एवं लेख लिखने का शौख, लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र से लेकर कई पत्रिकाओं में स्थान प्राप्त कर तथा दूरदर्शन केंद्र लखनऊ से प्रकाशित पुस्तक दृष्टि सृष्टि में स्थान प्राप्त किया और अमर उजाला काव्य में भी सैकड़ों रचनाये पब्लिश की गयीं वर्तामन समय में जय विजय मासिक पत्रिका में सक्रियता के साथ साथ पंचायतीराज विभाग में कंप्यूटर आपरेटर के पदीय दायित्वों का निर्वहन किया जा रहा है निवास जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश पिन २२५४१३ संपर्क सूत्र - 9984172782