तराने बदल गये
अल्फाज छूटे जीवन के माने बदल गये
जलती हुयी शम्मा के तराने बदल गये
जीवन सारा जंग का मैदान लग रहा
हर दयार उनको अब शमशान लग रहा
दर्द की जागीर के हैं मालिक बने हुए
यहाँ राग छेड़ने वालों के गाने बदल गये
दहलीज फ़ना क्या हुयी दीवार लाँघते हैं
आरी चला के दरख़्त से बहार मांगते हैं
नजर उनकी राह टटोलती ही रह गयी
इस “राज” के सारे जमाने बदल गये
थी आरजू जिसकी वो मुकाम न मिला
पता यहाँ मिला पर मकान न मिला
खूब यहाँ मोड़ मिले वो मुड़ते चले गये
ठोकरें मिलने लगी तो बहाने बदल गये
राज कुमार तिवारी “राज”
