डूबते सूरज की लाली में उनकी ज़िंदगी का नया सफ़र चमक रहा था
लाइब्रेरी की बड़ी-बड़ी खिड़कियों से दोपहर की सुनहरी धूप लंबी लकीरों की तरह अंदर उतरकर किताबों पर बिखर रही थी। रैक पर रखी पुरानी किताबों की हल्की-सी खुशबू कमरे में घुली हुई थी, और उस सबके बीच, एक कोने में पुरानी लकड़ी की मेज पर सिर झुकाए आबिद बैठा था, जिसकी शक्ल-सूरत किसी फिल्मी हीरो से कम न थी। उसके चेहरे की बनावट, आंखों में सलीके से तैरती हुई चमक, और हल्की-सी मुस्कान में ऐसा खिंचाव था कि जो भी एक बार उसे देखता, बिना चाहे दोबारा देखने को मजबूर हो जाता। उसकी उंगलियां किताब के पन्ने पलट रही थीं लेकिन नजरें बार-बार उस दरवाजे की तरफ उठ जाती थीं, जैसे वह किसी का इंतजार कर रहा हो।
उसी वक्त लाइब्रेरी के शीशे के दरवाजे से वह लड़की अंदर आई जो आज तक इस जगह नज़र नहीं आई थी। उसके चेहरे पर एक सादी-सी मासूमियत थी, आंखों में गहराई थी, और मुस्कान में एक ऐसा सुकून था, जो किताबों के पन्नों में ढूंढ़ते-ढूंढ़ते भी दुनिया कम ही पाती है। उसने नीले रंग का सलवार-कुर्ता पहन रखा था, बाल पीछे मजबूती से बंधे थे, और हाथ में वह एक छोटा-सा बैग लिए हुई थी जिसमें से एक किताब और नोटबुक झांक रही थीं। धीरे-धीरे वह अलमारियों के बीच से गुज़रती हुई रैक के पास पहुँची, और एक उपन्यास निकालकर पढ़ने लगी।
आबिद की निगाह किताब के शब्दों से ज्यादा अब उस लड़की के नर्म चेहरे पर टिकी थी। कुछ पल दोनों की नज़रें मिलीं और फिर जैसे किसी अनकहे इकरार की तरह दोनों हल्का-सा मुस्कुरा दिए। यह उनकी पहली मुलाकात थी, लेकिन उस पल से वह लड़की आबिद के दिल में कहीं गहरे अपनी जगह बना चुकी थी।
दिन यूँ ही गुजरते गए। लड़की का लाइब्रेरी आना अब एक आदत बन चुका था और आबिद का मुस्कुराकर उसका स्वागत करना भी। शुरू-शुरू में उनकी बातें सिर्फ किताबों तक सीमित थीं,कौन-सा लेखक अच्छा है, किस नॉवेल की कहानी लम्बी लेकिन असरदार है,लेकिन धीरे-धीरे यह बातें किताबों की दुनिया से निकलकर ज़िंदगी के उन पन्नों तक जा पहुँचीं, जहाँ इंसान अपने दिल के सबसे करीब की बातें करता है। लड़की को महसूस होने लगा था कि वह आबिद की मोहब्बत में गिरफ्तार हो रही है, लेकिन यह मोहब्बत उसे खुशी देती थी, उसकी आंखों में चमक भर देती थी।
मगर लड़की इस बात से पूरी तरह ग़ाफ़िल थी कि आबिद शादीशुदा है और उसकी एक छोटी-सी प्यारी बेटी भी है। फिर एक दिन, जैसे किस्मत को ज़रूरी लगा कि सच सामने आ जाए, किसी ने लड़की के कान में यह बात डाल दी: “जिससे तुम मोहब्बत कर बैठी हो, वह पहले से शादीशुदा है।” सुनते ही उसका दिल जैसे किसी ने ज़ोर से मरोड़ दिया हो। कुछ लम्हों के लिए उसे लगा सब खत्म हो गया, पर जब उसकी नज़रें आबिद की तरफ उठीं तो वही नरम लहजा, वही आँखों की रौशनी, वही अपनापन… उसने खुद को अपने दिल के आगे बेबस पाया। मोहब्बत की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी थीं कि उन्हें उखाड़ना अब उसके बस में नहीं था।
और फिर एक दिन आबिद की दुनिया सचमुच बदल गई। उसकी बीवी की तबियत अचानक गिर गई। डॉक्टर ने लंबी जांच के बाद सिर झुकाते हुए कहा, “आपकी बीवी को आख़िरी स्टेज का कैंसर है… समय बहुत कम है।” आबिद के लिए जैसे ज़मीन खिसक गई। किताबें, लाएब्रेरी, और वह मासूम मोहब्बत,सबका रंग फीका हो गया। अब उसकी सारी तवज्जो सिर्फ बीवी के इलाज, उसके हर सांस के साथ रहने में लग गई।
इन्हीं दिनों उस लड़की ने अपने दिल का सारा भार किनारे रखकर दरवाज़ा खटखटाया। जब दरवाज़ा खुला, उसने बस इतना कहा, “मैं आपसे मिलने नहीं आई… मैं आपकी बीवी से मिलने आई हूँ।” आबिद ने चुपचाप किनारे होकर उसे अंदर आने दिया। वह बीमार और कमजोर औरत के पास इस तरह बैठी, जैसे बरसों का रिश्ता हो। वह कहानियां सुनाती, दवा का वक्त याद दिलाती, और उसे हंसाने की कोशिश करती। एक दिन बीवी ने उसका हाथ पकड़ कर कहा, “आबिद तुम्हारी बहुत तारीफ़ करते हैं… अब समझ गई क्यों।”
मगर एक रात बीवी की सांसें भारी हो गईं। वह बिस्तर पर पड़ी थी, आबिद उसका हाथ थामे था, लड़की खिड़की के पास खड़ी थी। आख़िरी बार बीवी ने आंखें उठाईं और धीमे स्वर में कहा, “आबिद… इसका ख़याल रखना… ये तुम्हारे साथ ही रहे।” और फिर वह हमेशा के लिए चली गई।
बीवी के जाने के बाद आबिद और उसकी नन्ही बेटी पर जैसे वीरानी उतर आई। बच्ची रोज़ पूछती, “पापा, अम्मी कब आएंगी?” और आबिद बस उसे सीने से लगाकर चुप रह जाता। लेकिन वह लड़की अब भी आती थी,बेटी के लिए खिलौने लाती, कहानियां सुनाती, और मां जैसे लाड़ से उसके बालों में उंगलियां फेर देती। वह घर के सूनेपन को अपने साये से भर देती थी।
एक दिन बच्ची ने मासूमियत से पूछा, “पापा, ये दीदी हमेशा हमारे साथ रहेंगी ना?” उस सवाल ने आबिद के दिल को गहराई तक छू लिया। उसी शाम उसने उसे उसी लाइब्रेरी के कोने में बुलाया, जहाँ उनकी पहली मुलाकात हुई थी। उसने लंबे समय तक खामोशी के बाद कहा, “हम दोनों अधूरे हैं… क्या हम एक-दूसरे को पूरा कर सकते हैं?” लड़की की आँखों में नमी थी, पर होठों पर हल्की मुस्कुराहट आई। “ये सवाल नहीं होना चाहिए था… ये तो कब का हो चुका था।”
कुछ दिनों बाद सादे से निकाह में, जिसमें सिर्फ चंद अपनों ने हिस्सा लिया, आबिद और वह लड़की एक रिश्ते में बंध गए। छोटी-सी बेटी दोनों के बीच बैठी थी, सबको देख-देखकर ताली बजा रही थी और हंस रही थी। घर की दीवारों में फिर से रौनक लौट आई।
कुछ महीनों बाद आबिद ने कहा, “हमने बहुत मुश्किलें देख लीं… अब वक्त है खुशियों को गले लगाने का। क्या ख्याल है, कश्मीर चलें?” और यों, तीनों ने सफर शुरू किया। वादियों की हवा, पहाड़ों पर जमी बर्फ, झील के किनारे की ठंडी नमी,सबने जैसे उनके दिलों में नया जीवन भर दिया। बेटी हरी घास पर दौड़-दौड़ कर फूल चुन रही थी, बीवी शॉल में लिपटी हल्की हंसी में झील के पानी को देख रही थी, और आबिद दूर खड़ा इन दोनों को देखकर एक गहरी सुकून भरी मुस्कान मुस्कुरा रहा था।
शाम को डल झील पर शिकारे में बैठकर, जब सुनहरी रोशनी पानी की सतह पर फैल रही थी, आबिद ने धीरे से कहा, “अब लगता है, हम सच में अधूरे नहीं रहे।” उसने बीवी का हाथ थामा, बेटी ने दोनों के बीच अपने हाथ डाले, और तीनों ने एक साथ दूर पहाड़ों की तरफ देखा, जहाँ डूबते सूरज की लाली में उनकी जिंदगी का नया सफर चमक रहा था। वादियां गवाह थीं कि तीन अधूरे लोग अब एक-दूसरे के साथ पूरी तरह मुकम्मल हो चुके थे।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह
