टप्पू चाचा
पिछला चुनाव जीतने क के बाद तो टप्पू चौधरी ठीक-ठाक था हमारे प्रधान जी से उसकी बहुत गाढ़ी वाली यानी पक्की दोस्ती हो गई थी। सबको अच्छा भी लगा परंतु हमारे प्रधान जी के विरोधियों को यह बात पची नहीं और उन्होंने तरह-तरह से टप्पू चाचा को गरियाना और कोसना शुरू कर दिया। परंतु समय का खेल है। अगली बार टप्पू चाचा चुनाव हार गए तो उन्होंने अपनी चौधराहट के तेवर दिखाने शुरू कर दिए। पर हमारे यहां कहते हैं कि समय का ही सब खेल है। समय बलवान होता है। समय के कारण ही अर्जुन से भीलों ने गोपीकाएं लूट ली और अर्जुन का गांडीव धनुष उस समय नहीं चला। ऐसा ही समय का खेल टप्पू चाचा के साथ हुआ और वह आप तीसरी बार फिर से चौधराहट पा गए।
बस अब क्या था अब तो उनके तेवर ही बदल गए। आखिर और लोगों को कैसे पता चले कि टप्पू चाचा इस बार चौधरी बन गए हैं तो उन्होंने जो बातें अपने चुनाव में कहीं थीं , उन सभी का उल्टा करने लगे ताकि लोग जान लें कि अब टप्पू चाचा ही चौधरी है। कहते हैं राजनीति में जिस सीढ़ी के सहारे आप ऊपर उठ चढ़ चढ़े हैं। सबसे पहले उसे ही हटा दें। तो सबसे पहला काम टप्पू चाचा ने यही किया कि जिस खास यानी जिगरी या पक्के दोस्त ने उन्हें चुनाव जितवाने में मदद की सबसे पहले उसी की ऐसी तैसी करनी शुरू कर दी और उसे बताना शुरू कर दिया कि अब मैं चौधरी बन गया हूं और आपने जो मेरी मदद भी की थी , वह मेरे ऊपर एहसान नहीं था अपितु मैंने ही आपकी मदद को स्वीकार करके आपके ऊपर एहसान किया था। अब बताओ यह कितनी बड़ी बात है न, नया कीर्तिमान स्थापित करने का काम है यह कि जो आपकी मदद करें सबसे पहले उसी की ऐसी तैसी करो क्योंकि अब तो आप चौधरी हो ही गए हैं। तो आपका कोई क्या कर लेगा। यह कितना बड़ा काम किया टप्पू चाचा ने क्योंकि यह हर एक के बस का तो नहीं है। हमारे यहां तो किसी की शादी विवाह आदि में कोई वैसे ही कुछ काम उसके लायक हो , तो पूछने चला जाए तो हमारे यहां उसे भी अपने समारोह यानी फंक्शन में बुला ही लेते हैं । पर यूं कहूं कि बुलाना ही पड़ता है क्योंकि ऐसे अच्छा नहीं लगता क्योंकि वह बेचारा मदद को पूछने तो आया था। पर टप्पू चाचा तो ठहरे टप्पू चौधरी उन्होंने तो इसका उल्टा ही करना और उन उन का सोचना था कि उसे दोस्त ने किसी मतलब से ही मदद की होगी। तो भला अब मैं उसे अपनी चौधराहट को क्यों नहीं दिखाऊं और उन्होंने ऐसे दोस्त को भी खूब मन करके चौधराहट दिखाई।
चलो यह तो उनका अपना मामला था। पर चौधराहट का तो नशा ही कुछ और होता है जैसे भगवा आतंक नाम की कोई चीज न होते हुए भी चौधराहट के चक्कर में भगवा आतंकवाद पैदा करने का पूरा प्रयास किया गया तो ऐसा ही नशा टप्पू चौधरी पर भी चढ़ गया और उसने जो बातें कहीं थी उन सबके उल्टा करना शुरू कर दिया। जब उसने दोस्त को धोखा दे दिया तो उसे बहुत मजा आया क्योंकि इस से उसकी चौधराहट और पुख्ता यानी मजबूत हो गई। इसलिए उसने हमारे प्रधान जी को भी उंगली करना शुरू कर दिया। प्रधान जी को भी छेड़ना शुरू कर दिया। पर उसे पता नहीं था यह पूरा खांटी आदमी है इसने दुनिया की खाक यूं ही नही छानी है। घर बार छोड़कर इसे अच्छे अच्छे काम करने का जूनून है और इस के लिए अपने देश की सेवा तो और भी बड़ी बात है ।
उस ने सोचा कि इस खांटी प्रधान को कैसे काबू किया जाये। तो उस ने दावत का लालच दिया। पर वह दावत के लालच में आने वाला कहाँ था। उस ने कहा कि मैं तो जब पहले भी तुम से मिला था तो तब भी मैंने दावत नहीं उड़ाई थी अपितु पानी पी कर ही रहा था। इस लिए मुझे दावत का कोई शौक नहीं है और न ही मेरे पास इतना टाइम यानि समय है कि मैं किसी ऐरे गैर के यहां दावत खाता फिरूं। मुझे दुनिया के देशों की भी सेवा करनी है। बस फिर क्या था। टप्पू चाचा को गुस्सा आ गया। अब वे क्या करें तो उन्होंने सोचा कि चलो इसका कोई इलाज सोचते हैं। तो उस ने सोचा एक ही लालची कुत्ता है जो हड्डी दीखते ही दम हिलने लगता है। अत: टप्पू चाचा ने उसे ही पुचकारना शुरू कर दिया। और वह भी जैसे छाछ पी कर सर्दियों में पिल्ला फूल जाता है। वह भी ऐसे ही फूल कर कुप्पा हो गया। पर उसे क्या पता था कि वह कितनी बड़ी गलती कर रहा है। उस से सोचा टप्पू चाचा है न वे ही बचा लेंगे। पर बात बनी नहीं। उस के लिए यह बहुत भारी पड़ा गया। परन्तु जब बंकर में ही हगने मूतने की नौबत आ गयी और आफत ज्यादा बढ़ गई तो बाद में गिड़गिड़ाने लगा। रोने पीटने लगा।
पर हमें दया करने की गलती की भी आदत है तो जल्दी ही दया भी कर देते हैं। सो कर दी। फिर टप्पू चौधरी को लगा कि यह तो मामला हाथ से फिर चला गया। अब क्या किया जाये। तो उस ने खुद मियाँ मिठ्ठू बनना शुरू कि मन न तेरा मेहमान। और बिना बात बेगानी शादी में दीवाने अब्दुला की तरह उछल कूद मचानी शुरू कर दी। पर झूठ ज्यादा दिन थोड़ी चलता है बेशक कुछ हमारे कुनबे के रूठे हुए लोग उस की हम में हाँ मिलाने लगे तो भी कुछ न हुआ।
फिर जब उसे कुछ नहीं सूझा तो उस ने सोचा कि चलो कोई और गीदड़ भभकी दी जाये और उस से खूब अपनी ऐसी तैसी करवा ली। कभी अर्थ व्यवस्था को मरा बता दिया तो कभी कुछ और बकवास की। पर हाथी की सेहत पर कुछ नहीं असर पड़ता है। वह तो अपनी चाल चलता रहता है। और वह उसी मस्त चाल में चल रहा है।
पर मैं सोचता हूं कि आखिर इस टप्पू चौधरी का इलाज क्या है ?उसे कैसे समझाऊं कि भाई तू अपनी हरकतों से बाज आ जा। पर उसे तो उंगल करने की आदत जो हो गई है। पर जिसे कोई आदत हो जाती है , वह बाज नहीं आता। पर यह भी तो कहावत हमारे यहां प्रचलित है कि पहलवान को पहलवान बहुतेरे , घर न हों तो बाहर बहुतेरे हैं। इसलिए हम तो इसका इलाज बंधेंगे ही क्योंकि अब तो हम किसी से कम नहीं है। पर कोई और भी इलाज कर ही देगा। आखिर समय बहुत बलवान होता है। पर हमारे प्रधान भी क्या कम चौधरी नहीं है। पर वे बिना बात की इस तरह की चौधराहट नहीं दिखते फिरते हैं। क्योंकि वे न तो किसी को दूसरे के विरुद्ध भड़काते हैं न ही आग लगाते हैं अपितु वे तो सुलह करवाने के पक्ष में रहते हैं। इसलिए ही उसे आज सब पूछते भी हैं। इस लिए मुझे तो पूरा भरोसा है कि जो उसे छेड़ता है वह उसे बिल्कुल भी नहीं छोड़ता है।
इसलिए लग रहा है ऐसे यानी टप्पू चौधरी जैसे का इलाज भी वह आसानी से कर देगा। मुझे पूरी उम्मीद है क्योंकि हमारे यहां आदमी जब सठिया जाता है तो उसे उसके हाल पर छोड़ देते हैं। यह अब टप्पू चौधरी का हाल भी हो रहा है। धीरे-धीरे लोग इसे भी कहने लगेंगे की मरने दो ,भौंकने दो कितना भौंकेगा। बेचारा सठिया गया है।
— डॉ वेद व्यथित
