खट्टा-मीठा : निशाना चूक गया
हमारे प्रधानमंत्री जी ने भी पुष्टि की है कि देश की जनता बहुत नाराज़ है। एक बुजुर्ग वकील साहब ने सर्वोच्च कोठे में जाकर चीप अन्यायाधीश पर अपना क़ीमती जूता फेंका, परन्तु उनका निशाना चूक गया। देश की जनता इसी से नाराज़ है। जनता इस बात से नाराज़ हैं कि निशाना चूका क्यों? इस बात की पूरी जाँच होनी चाहिए कि इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है?
मात्र १०-१२ फ़ीट की दूरी से भी निशाना चूक जाना एक बड़ी राष्ट्रीय त्रासदी है। इसके लिए दो कारण ज़िम्मेदार हो सकते हैं- या तो वकील साहब की अधिक उम्र के कारण निशाना चूका है, क्योंकि बताया जाता है कि उनको पार्किंसन का रोग भी है। या फिर दूसरा कारण हो सकता है- अभ्यास की कमी। लगता है कि वकील साहब ने वहाँ जाने से पहले जूता फेंकने की पर्याप्त प्रक्टिस नहीं की थी, इसलिए निशाना चूक गया और देश एक ऐतिहासिक पल से वंचित रह गया।
इन दोनों संभावित कारणों को दूर करने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास करने चाहिए। सबसे पहले तो इस प्रक्षेपण का दायित्व किसी बुजुर्ग वकील के कंधे पर डालने के बजाय किसी स्वस्थ नौजवान वकील को उठाना चाहिए, जिसकी बाजुओं में इतनी शक्ति हो कि २०-२५ फ़ीट दूर से भी सही निशाना लगा सके। हमारे देश में ऐसी प्रतिभाओं की कमी नहीं है, बस उन्हें खोजने की आवश्यकता है।
दूसरी संभावना को दूर करने के लिए जूता प्रक्षेपण खेल के लिए विशेष मैदान बनाये जाने चाहिए, जहाँ इसका प्रशिक्षण दिया जाये और अभ्यास कराया जाये। इस कार्य में ५०० रुपयेवाले उन पत्थरबाज़ों की सहायता ली जा सकती है, जिनको सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने का अच्छा अनुभव हो। इस कार्य में जेल जाना अतिरिक्त योग्यता मानी जाएगी।
निशाना चूकने के कारण ही हमारा देश ओलम्पिक, कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों में अनेक क़ीमती पदकों से वंचित रह जाता है। इसलिए इस कमी को दूर करना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। हमें प्राथमिकता के आधार पर इस कमी को दूर करने का संकल्प ले लेना चाहिए।
— बीजू ब्रजवासी
कार्तिक शुक्ल. १, सं. २०८२ वि. (७ अक्टूबर, २०२५)
