कभी खुद की परछाई भी संसय में डाल देती है
हर रोज़ तेरा,तेरी खुद की परछाई से यूं जूझना ।
रूदन भरीआवाज़ मेंआक्रोश से तेरा छटपटाना।।
देख कर मुझे तेरे इस दर्द का अहसास होता है,
कोई तो वज़ह होगी तेरे इस करूणित स्वर में।
हर रोज़ अपनी परछाई से रुबरु तेरा यूं जूझना,
रुदन भरी आवाज़ में आक्रोश से तेरा छटपटाना।।
संघर्षित यह पल तेरा भ्रमित तुझे कौन समझेगा,
इस तरह देख कर कोई भी तुझे पागल ही कहेगा।
लगा रहता है,हर किसी का इस गली में आना जाना,
रूदन भरी आवाज़ में आक्रोश से तेरा छटपटाना।।
तेरी परछाई हर रोज़ तुझसे इक सवाल पूछती,
क्यों नहीं अपनी परछाई की यह सुद तुझे होती।
सीसे के इस टुकड़े का तुझे यूं संसय में रखना,
रुदन भरी आवाज़ में आक्रोश से तेरा छटपटाना।।
देखती हूं हर रोज़ तेरी दर्द भरी व्याकुलता को,
समझने की कोशिश कर रही हूं तेरे इस भ्रम को।
इस घर से तुझे तेरी परछाई का यूं परेशान करना,
रूदन भरी आवाज़ में आक्रोश से तेरा छटपटाना।।
— सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ “सहजा”
