हर सफलता के पीछे एक अधूरी रात होती है
चांद आधा सोया,
सपनों की डोर,
अब भी तनहा।
नींद से दूर,
आँखें जागतीं,
मंज़िल पुकारे।
क़दम थके हुए,
दिल मगर बोले,
रुकना मत अब।
दीये की लौ,
अंधेरों से लड़े,
वक्त के साथ।
हर ठोकर कहे,
यही है रास्ता,
सफलता का द्वार।
पसीने की बूंदें,
कहती हैं चुपके,
मेहनत का गीत।
तारे झुकते हैं,
जिनके हौसले,
आसमान छूते।
थकान के बीच,
उमंग जागती,
नव प्रभात में।
हर रात अधूरी,
सपनों की खातिर,
सुबह बनती।
हर सफलता के संग,
कहानी बस इतनी,
एक अधूरी रात।
— डॉ. अशोक
