गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

चाँद जब उतरा ज़मीं पर चाँदनी ही छा गयी।
ख़ूबसूरत इस फ़ज़ा में ख़ुशनुमाई आ गयी।।

माना है महबूब तुमको गर दिया धोखा हमें।
तुम समझ लेना कि हमको मौत सजनी भा गयी।।

हम वफ़ा तुमसे निभाते ही रहे हैं आज तक।
ग़ैर की महफ़िल तुम्हें फिर किसलिए फुसला गयी।।

हिज्र ने इतना जलाया साँसें थमती-सी लगें।
राह तकते-तकते अब तो आँख भी पथरा गयी।।

रूठ कर हमसे गए हो लौट आओगे अगर।
हम समझ लेंगे ये कश्ती अब किनारा पा गयी।।

खेल क़िस्मत के सभी चाहे बिछुड़ना या मिलन।
ग़म के ये लम्हात शायद वो हमें समझा गयी।।

हमको इतना तो बता दो कैसी हैं मजबूरियाँ।
क्या ये दूरी रास्ता ही या नया दिखला गयी।।

वक़्त बीता जा रहा है लौट आओ आशना।
“अब जुदाई खल रही है ज़ुल्म ही लो ढा गयी।।”

जो रुला दे सोच हमको हरक़तें ऐसी न हों।
बात अपने दिल में जो थी वो तुम्हें बतला गयी।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’