सामाजिक

मन बावरा

कहते हैं मन के जीते जीत है मन के हारे हार…लेकिन अगर मानव मात्र के लिए इस संसार में कुछ सबसे ज्यादा मुश्किल है तो वो है अपने मन को जीतना। हर पल जीवन में अगर कोई चीज हमें सबसे ज्यादा नियंत्रित करती है तो वो है हमारा मन ।
मन को 11वीं इन्द्रिय माना जाता है, जो हमारी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के बीच नियामक का काम करता है। ये इन्द्रियां और मन हमारे ज्ञान और कर्म के साधन मात्र न होकर इस संसार से मिलने वाले सुख और दुःख को महसूस करने के भी साधन हैं। संसार का सुख भोगने में मन विचार और कल्पना के द्वारा भी सहायता करता है।
मनुष्य का मन संसार की सबसे अशांत चीज है। इस अशांति के कारण ही मनुष्य में तमाम तरह की इच्छाएं जन्म लेती हैं और वह संसार में अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भटकता रहता है। लेकिन जैसे ही मनुष्य को अपनी इच्छा की एक वस्तु मिलती है उसका अशांत मन तुरंत किसी दूसरी चीज की तलाश में दौड़ने लगता है। मन की यह अशांति मनुष्य के जीवन में हमेशा एक चुनौती के रूप में साथ- साथ चलती है।
कई बार तो मनुष्य यही नहीं समझ पाता है कि आखिर मन चाहता क्या है। कभी किसी दिशा में भागता है तो कभी कहीं और।हमारा मन हमेशा एक सुरक्षा चाहता है और एक सुरक्षित समय और काल के दायरे में किसी भी परिवर्तन से हमेशा इनकार करता है,चाहे वो परिवर्तन कैसा भी हो। उसे हमेशा कंफर्ट जोन में रहना ही पसंद है।जैसे अगर हम सो रहे हैं और ये सोचकर सोते हैं कि सुबह जल्दी जाग जाना है।हम सुबह जागते भी हैं तो हमारा मन हमें बिस्तर छोड़ने से रोकता है।और शायद अधिकांश लोग अपने मन के बहकावे में आ भी जाते हैं।तभी तो मन हमेशा हमें डराकर रखता है ताकि हम बिना उसकी अनुमति के कोई काम न करें।कई बार हम कोई निर्णय लेते हैं जो सत्य पर आधारित होता है तो हमारा मन हमें ये कहकर डराता है कि कहीं इससे हम पर कोई मुसीबत न आ जाए।
मेरा अनुभव ये कहता है कि मन हमेशा ही हमें आगे बढ़ने से रोकता है चाहे वो किसी अच्छी आदत को अपनाना हो या कोई साहसिक निर्णय लेना।मन एक अवरोधक के रूप में आकर खड़ा हो जाता है।ऐसे में वही लोग आगे बढ़ पाते हैं जो अपने मन के दुराग्रह को काट कर अपने विवेक पर भरोसा करते हैं।
जीवन तरह- तरह के अवरोधों से भरा पड़ा है।हमारा मन चाहता है कि प्रत्येक वस्तु आसानी से प्राप्त हो जाए।इसके लिए न तो कोई चुनौती झेलनी पड़े और न ही कोई परिश्रम करना पड़े।पर क्या जीवन में ऐसा हो पाना संभव है। इसका उत्तर है बिल्कुल नहीं। बल्कि चुनौतियां तो जन्म के साथ ही या कई बार उससे पहले ही प्रकट हो जाती हैं। मां के गर्भ में ही कई बार बच्चे अपने जीवन को संकट में लेकर ही जीवन की यात्रा शुरू करते हैं। लेकिन उनकी जिजिविषा ही उन्हें उस परिस्थिति से बाहर निकालने में मदद करती है।जीवन की यात्रा आसान तो बिल्कुल नहीं है।अगर हम जीवन को एक सड़क मान लें और खुद को उस पर चलने वाली एक गाड़ी तो हम पाते हैं कि गाड़ी कभी भी सड़क पर एक जैसी गति से नहीं चलती । कभी तेज तो कभी बहुत धीरे और कभी तो रुक ही जाना पड़ता है। सबसे ज्यादा विशेष बात यह है कि गाड़ी चलाते समय हमें सबसे ज्यादा ध्यान ब्रेक पर देना होता है।अगर हम समय रहते ब्रेक पर नियंत्रण न रख पाए तो इसके बहुत से दुष्परिणाम सामने आ जाते हैं।
ठीक ऐसे ही हमारा जीवन है और गाड़ी है हमारा मन,जो कि अनियंत्रित गति से भागता है।हमें अपने मन को ऐसे अनुशासित करना चाहिए कि जब भी जीवन की सड़क पर गड्ढे आ जाएं या रास्तों पर भीड़ हो तो वो नियंत्रण रूपी ब्रेक का सहारा लेकर खुद को स्थिर व संयमित रखे। हमारे जीवन का लक्ष्य जितनी ही ऊंचाई पर होगा,उस तक पहुंचने का रास्ता उतना ही मुश्किल होगा। अगर ब्रेक पर नियंत्रण नहीं होगा तो न केवल स्वयं के दुर्घटनाग्रस्त होने की संभावना बनी रहेगी बल्कि इससे हम औरों को भी भरपूर नुकसान पहुंचाने की स्थिति में आ सकते हैं।

मन का एक और प्रमुख काम भाषा और विचार को जन्म देना है। मन और भाषा सदा साथ-साथ रहते हैं। जब तक मनुष्य के मस्तिष्क में मन सक्रिय है, भाषा का जन्म होगा ही। यदि हम चिंतन की भी भाषा को मिलाकर देखें तो पाएंगे कि हमारी भाषा का 99 प्रतिशत से ज्यादा अनावश्यक है। यह अनावश्यक भाषा स्पष्टता लाने के बजाय भ्रांति ही अधिक पैदा करती है। यहां पर हम वस्तुस्थिति को मन रूपी सड़क पर विचरने वाली भाषा रूपी ट्रैफिक से समझ सकते हैं। हमारे मन की सड़क पर अगर अवांछनीय ट्रैफिक नहीं होगा तो हमारा मन व्यवस्थित रहेगा और अगर मन व्यवस्थित है तो यह शायद मानव की सबसे बड़ी उपलब्धि है। अन्यथा अनावश्यक विचार सदैव हमारे मन को विचलित करते रहेंगे और हमारे मन में इनके टकराव से तमाम तरह की दुर्भावनाएं जन्म लेंगी। एक फिल्म में कल्पना की गई थी कि अगर मनुष्य स्पर्श के माध्यम से आपस में संचार करता तो…
तब दुनिया कितनी शांत होती।कोई किसी से झूठ नहीं बोल सकता,न ही कोई अनावश्यक विचार जन्म लेता। तब मनुष्य अपनी ऊर्जा का अधिकांश भाग रचनात्मक कार्यों में लगाता।कितनी सुंदर कल्पना है।पर दूसरे पहलू से विचार करें तो भाषा ही है जो मनुष्य को संसार के अन्य जीवों से विशिष्ट बनाती है। भाषा ने दुनिया में संवेदनशील साहित्य को और संगीत को जन्म दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि मन में ऐसे विचारों को स्थान दें जिनसे सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो।इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि हर व्यक्ति की पहुंच अच्छे साहित्य और सद्विचारों तक हो।

— लवी मिश्रा

लवी मिश्रा

कोषाधिकारी, लखनऊ,उत्तर प्रदेश गृह जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश