जिम्मेदारियों का बोझ
सुबह जरूरतों की फेहरिस्त
लेकर घर से निकलता हूँ
कुछ ना कुछ कोई ना कोई जरूरत
रोज मुँह बाए खड़ी रहती है
सुबह के निकले- निकले देर
रात गए मैं थका-थका लौटता हूँ
थोड़ा सा सोता हूँ
अभी ठीक से नींद पूरी भी नहीं हो पाती
कि अलार्म जगा देता है मुझे
बिखरा- बिखरा सा मैं खुद को समटेता हूँ
अगली जरूरत पूरी करने निकल पड़ता हूँ
इस बीच ना जाने कितनी ऋतुएँ
बदलीं , कई- कई महीने बीत गए
सालों बीत गए अपना चेहरा देखे
मैं बालों का हाल नहीं देख पाता
जो अब नाम मात्र के बचे हैं सिर पर
बालों का करना भी आखिर क्या है अब
नहीं देख पाता गड्ढों में धँसी आँखें
तीज- त्योहारों को जैसे मनाने की
फुर्सत ही नहीं है
टाँग लेता हूँ आशाओं – आकांक्षाओं की लबादा
जिम्मेदारियों का बोझ और
फिर से निकल पड़ता हूँ जरूरतों
को पूरा करने ..
मैं बार बार लौटता हूँ घर
लेकिन अपने भीतर जैसे लौटना ही भूल गया हूँ।
भूल गया हूँ
अपनी पसंँद का खाना -पीना
मनचाहे कपड़े ..
थोड़े में काम कैसे चल सकता है
इस पर विचार करने लगा हूँ
घूमने -फिरने का अब समय नही है
गृहस्थी में जुत गया हूँ , मैं
जरूरतों का लबादा ओढ़े मैं
भी भीड़ में शुमार हो गया हूँ
जहाँ मेरी तरह के लोगों ने
उठा रखा हैं , जिम्मेदारियों का बोझ
भीड़ में हम सब ऐसे ही गुम हैं
जिम्मेदारियों का लबादा ओढ़े !
— महेश कुमार केशरी
