पिता
पिता बूढ़े होते जा रहें हैं
बूढ़े बहुत बूढ़े
जिन्हें मैं गोद में
उठा सकता हू़ँ
हल्के बहुत हल्के
पिता की उम्र बढ़ रही है
शरीर घट रहा है
खुराक तेजी से
कम हो गई है
पहले से आधे बचे हैं पिता
इतना आधे हो चुके हैं
जितना दस -पँद्रह किलो का
कोई बच्चा
बमुश्किल से आधी रोटी ही खा पाते हैं
पिता
असंख्य झुर्रियों से पट गया है
उनका चेहरा
चलते हुए काँपते हैं , पिता
मैं उनकी ताकत बनना चाहता हूँ
पैर बन जाना चाहता हूँ , पिता के
जिससे वे लँबे- लँबे डग भर सकें
पहले की तरह
या बन जाना चाहता हूँ लकड़ी की
कोई नाव जिसमें वो
मेरी पीठ पर बैठकर
दृश्यों का आनंद ले सकें
पिता
अखबार में शब्दों को बहुत टटोल-
टटोल कर पढ़ते हैं
आँखों में मोतियाबिंद उतर आया है
उनको अब कम दिखाई देने लगा है
अभी बरसात है ठंडी में आॅप्रेशन
करवाएँगे
मैं पिता से कहना चाहता हूँ
कि जब तक आॅप्रेशन नहीं हुआ है
तब तक मैं आपको अखबार के काॅलम
पढ़कर सुनाता हूंँ
आप मेरी आँखों से पढ़िए अखबार !
मैं भरना चाहता हूँ
उनमें घट गया आत्म-विश्वास
जो घरेलू झगड़ों में कहीं बिखर
गया है
रोज -रोज के घरेलू झगड़ों से
पिता परेशान हो गए हैं
अभी ठंड है , पिता चाय पी रहें हैं
उनका हाथ काँपने लगा है प्याली
पकड़ते वक्त
मैं पिता के हाथ बनना चाहता हूँ
भर देना चाहता हूँ उनमें ताकत
एक झटके से
पिता
उतर नहीं पाते सीढ़ियों से
वो बहुत धीमा बोलते हैं
ऊँचा सुनते हैं
धीरे -धीरे पिता अवसान की तरफ
बढ़ रहें हैं
मैं , अवसान की सीढ़ियों पर
उन्हें उतरते हुए साफ देख रहा हूँ
समय जैसे रूक गया है
मेरी रूलाई फूट पड़ी है ….!
पिता सूरज की तरह लौट
रहें हैं !
अस्ताचल गामी सूर्य होते जा रहें हैं
पिता
धीरे – धीरे पृथ्वी में भीतर बहुत भीतर
धँसते जा रहें हैं पिता .
क्षितिज पर लालिमा बिखेरते हुए
मुस्कुराते हुए विदा हो रहें हैं
पिता!
अब चारों तरफ अँधेरा है और
मैं फूट -फूटकर रो रहा हूँ!
— महेश कुमार केशरी
