कविता

विचित्र चित्र तेरी चितवन का!

(मधुगीति 250813)

विचित्र चित्र तेरी चितवन का,
चितेरा तू रहा है त्रिभुवन का;
चित्त का अहं औ महत भव का,
भाव की हर लहर की थिरकन का!

देख लेते हो जो नहीं प्रकटा,
सृष्टि के पट पै जो नहीं उभरा;
उड़ेल देते कितने रंग रूपक,
कितने आयाम दिखा जाते त्राटक!

तटस्थ रहके ताक सब लेते,
दृष्टा बन दृश्य तुम बदल देते;
दृष्टियाँ आतीं सृष्टि हो जातीं,
तुम्हारे नाचे नच सभी जाते!

नट कोई नाट्य किए चल देता,
निदेशन तुमरे द्युति दिखा जाता;
आ न फिर पाता और गति पाता,
त्राता क्या-क्या न जाने करवाता!

जीव जग आके मोह फँस जाते,
निदेशक कथानक भूल जाते;
रमे ‘मधु’ प्रभु के चक्षु सब लखते,
उठाते लुत्फ़ उनकी उल्फत का!

— गोपाल बघेल ‘मधु’

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