ग़ज़ल
चुना था तुम्हें साथी जिंदगी के सफर के लिए,
पर तुमने दे दिया एक गम उम्र भर के लिए।
भूल गयी तुम सारी दुनिया छोड़ दी थी मैंने,
सुर्खियाँ बन गया था मैं सारे शहर के लिए।
मोहब्बत की छांव में दुःखों की धूप मिली,
अस्तित्व बचा ही कहाँ अब असर के लिए।
चूर चूर हुए हसीन ख्वाब जो देखे थे कभी,
उठती है कसक दिल में गुल-मुहर के लिए।
जिसमें नजर आता था अक्स कभी मेरा,
तरस गया हूँ आज मैं उस नजर के लिए।
पत्थर बन गयी हो, मार कर हसरतें मेरी,
दर्द ही दर्द बचा है अब इस बहर के लिए।
आओ “विकास” चलें यहाँ से दूर कहीं अब,
मेरे ये पाँव उठते ही नहीं उस घर के लिए।
— डॉ विकास शर्मा
