भाषा
प्रसूता जननी में
उत्पन्न हुए जो भाव
तत्क्षण जन्मी मेरी भाषा
मेरे जन्म के साथ
मधुर लोरियों ने उसे जन्म दिया
तब मेरे श्रवण रंध्रों में पड़ी मेरी भाषा
पिता ने हृदय में प्यार भर कर
जब मुझे कठोरता दिखाई
तब जानी सीखी मैंने अपनी भाषा
फिर बाल सखाओं ने
जब बिगाड़ बिगाड़ कर पुकारा मेरा नाम
तो मित्रवत हो गई मेरी भाषा
और प्रिया ने कहा जब मुझ से
कोई अनाम सा मधुर सम्बोधन
तो रसवंती हो गई भाषा
फिर उपाधियों ने तिरोहित किया
मेरा नाम
तो गर्वोन्नत हुई भाषा
फिर अंत में शान्ति की कामना में
बीत गया मैं
भाषा के साथ
ॐ शांति ॐ शान्ति ॐ शान्ति।
— डॉ. वेद व्यथित
