ग़ज़ल
गुस्सा उबल रहा था मगर लोग चुप रहे
नाटक सा चल रहा था मगर लोग चुप रहे
अपमान के भी घूंट सभी पी के मस्त थे
शायर निकल रहा था मगर लोग चुप रहे
अपशब्द कहके भी थमा न पोडियम पे वो
रह रह उछल रहा था मगर लोग चुप रहे
कैसी थी अदा बोलने की कैसी तो ज़बाँ
नश्तर-सा चल रहा था मगर लोग चुप रहे
तालीम के इदारे में वो बेशऊर शख़्स
छाती पे मूंग दल रहा था लोग चुप रहे
फासिस्ट अहंकार में डूबा हुआ था यों
हर मुल्क जल रहा था मगर लोग चुप रहे
लेखक के स्वाभिमान को पैरो तले कुचल
वह विष उगल रहा था मगर लोग चुप रहे
कैसे प्रलोभनों में थे सब सर झुकाए लोग
वह सर कुचल रहा था मगर लोग चुप रहे
— ओम निश्चल
