गीत – निकल पड़े हैं सूरज दादा
मफ़लर बाँधे शॉल लपेटे
निकल पड़े हैं सूरज दादा।
बेलें वृक्ष शांत हैं सारे
चादर ओढ़ कुहासे वाली
मौन खड़े हैं जमे तुहिन से
नहीं बजाते पल्लव ताली
तनिक नहीं गरमा पाते हैं
करते थे जो पहले वादा।
झाँक रहे हैं ऊपर से सब
किंतु नहीं वश उनका चलता
बीच गगन में दिव्य दिवाकर
शीत आक्रमण नहीं सँभलता
पता नहीं हिम के प्रकोप की
मंशा का क्या रहा इरादा।
चिड़ियाँ कहाँ सिमट कर बैठीं
एक नहीं देती दिखलाई
कंबल ओढ़े छिपे हुए जन
कोई ओढ़े पड़ा रजाई
जो अभाव में त्रस्त लोग हैं
कष्ट सहन करते हैं ज्यादा।
— डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम्’
