लोहड़ी का त्योहार
लोहड़ी का त्योहार उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब और हरियाणा की आत्मा है। यह केवल एक फसल उत्सव नहीं है, बल्कि कड़कड़ाती ठंड में अपनों के साथ गर्माहट बांटने का एक सुंदर बहाना है। यह त्योहार हिमाचल प्रदेश में भी पूरे हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
i) लोहड़ी का समय- लोहड़ी हर साल मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले, यानि 13 जनवरी को मनाई जाती है। यह त्योहार पौष के महीने के अंत और माघ के आगमन का प्रतीक है। ज्योतिषीय दृष्टि से देखें तो यह सूर्य के उत्तरायण होने और दिनों के बड़े होने की शुरुआत का जश्न है।
ii) दुल्ला भट्टी की कहानी- लोहड़ी का जिक्र हो और ‘दुल्ला भट्टी’ का नाम न आए, यह मुमकिन नहीं। मुगल काल के दौरान दुल्ला भट्टी पंजाब के एक नायक थे, जिन्हें ‘पंजाब का रॉबिनहुड’ कहा जाता था। उन्होंने न केवल अमीरों को लूटा, बल्कि गरीब लड़कियों को गुलामी से बचाकर उनकी शादी करवाई। आज भी लोहड़ी के गीतों में उनका आभार व्यक्त किया जाता है:
“सुंदर मुंदरिये… हो! तेरा कौण विचारा… हो! दुल्ला भट्टी वाला… हो!”
iii) उत्सव की रस्में: आग और घेर-लोहड़ी की शाम को खुले आंगन या चौराहे पर पवित्र अग्नि जलाई जाती है। लोग इस अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करते हैं और उसमें तिल, गुड़, रेवड़ी और मूंगफली अर्पित करते हैं। यह अग्नि को आभार प्रकट करने का तरीका है, जो हमें जीवन और ऊर्जा प्रदान करती है।
iv) खान- पान- पारंपरिक खान-पान इस त्योहार का स्वाद सरसों के साग और मक्के की रोटी के बिना अधूरा है। इसके अलावा:
तिल-गुड़: ये शरीर को गर्माहट देते हैं।
मूंगफली और रेवड़ी: दोस्तों और रिश्तेदारों में बांटने का मुख्य प्रसाद।
गन्ने का रस और खीर: पंजाब के ग्रामीण इलाकों में गन्ने के रस की खीर बनाने की भी परंपरा है।
v) भंगड़ा, गिद्धा और खुशियां- लोहड़ी मेल-जोल का त्योहार है। ढोल की थाप पर पुरुषों का भंगड़ा और महिलाओं का गिद्धा माहौल को जीवंत बना देता है। यह त्योहार उन परिवारों के लिए विशेष होता है।जहाँ हाल ही में नई शादी हुई हो या किसी बच्चे का जन्म हुआ हो। इसे ‘पहली लोहड़ी’ के रूप में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
vi) सामाजिक संदेश- आज के समय में लोहड़ी केवल फसलों का उत्सव नहीं रह गया है, बल्कि यह ‘लोहड़ी धी दी’ के रूप में एक सामाजिक बदलाव का संदेश भी दे रहा है। अब लोग केवल बेटों के जन्म पर ही नहीं, बल्कि बेटियों के जन्म पर भी उतनी ही खुशी से लोहड़ी मनाते हैं।
vi) निष्कर्ष- लोहड़ी हमें प्रकृति से जोड़ती है और सिखाती है कि कैसे कड़ाके की ठंड में भी सामूहिक प्रेम और आग की तपिश से जीवन को खुशहाल बनाया जा सकता है। यह त्योहार नई शुरुआत, समृद्धि और आपसी भाईचारे का प्रतीक है। लोहड़ी का यह उत्सव हमें एक साथ रहने एवं एक साथ कार्य करने का संदेश देता है। यह उत्सव एक प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
— वंशिका संधू
कक्षा – दसवीं।
