मीठी यादों की टीस
शाम की खिड़की
बीता कल झाँक गया
पुरानी हँसी
आज भी साथ चलती
डायरी के पन्ने
खामोश बोल उठे
सूनी गलियाँ
कदम पहचानती हैं
चाय की भाप में
मां की आवाज़
टूटे खिलौने
अब भी मुस्कुराते
वक़्त बहुत आगे
दिल वहीं ठहरा
यादें कहती हैं
दर्द भी अपना है
— डॉ. अशोक
