मध्यप्रदेश की अयोध्या : भोजशाला

उत्तरप्रदेश की अयोध्या व काशी की भांति ही मध्यप्रदेश में भी एक अयोध्या है जिस पर बसंत पंचमी पर बड़ा आंदोलन चर्चा का विषय बनता है। विशेष रूप से बसंत पंचमी यदि शुक्रवार को पड़े तो प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था का विशेष ध्यान रखना पड़ता है, इसका कारण है कि भोजशाला को लेकर हिन्दू समाज व मुसलमान के बीच स्वामित्व का विवाद चल रहा है, जो सुप्रीम कोर्ट में है। इस वर्ष भी बसंत पंचमी 23 जनवरी शुक्रवार को होने पर सांप्रदायिक तनाव न बने इसे लेकर प्रशासन अलर्ट मोड पर है, जिले के सभी तहसील थानों पर विशेष सैन्य बल द्वारा शांति मार्च निकाला गया है, इस बार भी बसंत पंचमी को लेकर हजारों की संख्या में भोजशाला में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित राजा भोज द्वारा निर्मित संस्कृत का विद्यालय जो वाग्देवी माँ सरस्वती का मंदिर, यज्ञशाला, गुरुकुल भी रहा है, इसको लेकर आज पुनः विवाद की स्थिति बनी हुइ है। जबकि बसंतोत्सव को भोजशाला में मनाना कोई आश्चर्य का विषय नहीं, एक सामान्य व्यक्ति भी यह बता सकता है की भोजशाला हिन्दू संरचना है। क्योंकि इस्लाम के अंतर्गत बनी किसी भी संरचना में यज्ञशाला नहीं बनती, भोजशाला में 15 बाई 15 फिट की बहुत बड़ी यज्ञशाला स्थित है। वर्ष 1034 में मालवा के राजा महाराजा भोज द्वारा मां सरस्वती का मंदिर यज्ञशाला का निर्माण धार नगरी में करवाया गया जिसमें उस समय के तत्कालीन प्रसिद्ध मूर्तिकार मंथल द्वारा स्फटिक पत्थर से निर्मित मां-वाग्देवी के स्वरूप को प्राण प्रतिष्ठा करके भोजशाला में स्थापित किया गया। प्रतिदिन यज्ञ संस्कार करने से पूर्व सभी छात्र मां वाग्देवी की प्रार्थना करते थे, इतिहास उठाकर देखें तो हम जानेंगे कि यह वर्तमान में धार में स्थित भोजशाला यह राजा भोज द्वारा सनातनी विद्यार्थियों के संस्कृत पठन-पाठन व अनेक विधाओं में शिक्षण के लिए बनाया गया एक विश्वविद्यालय था। जिसमें लगभग 1100 से 1200 विद्यार्थी ज्ञान अर्जन करते थे तथा 80 से अधिक शिक्षक इनके अध्ययन व संचालन में अपनी भूमिका निभाते थे।
भोजशाला परिसर व समीप स्थित विजय मंदिर को तोड़कर बनाई अवैध मस्जिद की दीवारों से चिपके उत्कीर्ण पत्थर के स्लैब में अभी भी मूल्यवान नक्काशी किए हुए हैं। इसमें प्राकृत भाषा में भगवान विष्णु के कूर्मावतार के बारे में दो श्लोक लिखे हुए हैं। एक अन्य अभिलेख में संस्कृति व्याकरण के बारे में जानकारी दी गई है। इसके अलावा, कुछ अभिलेख राजा भोज के उत्तराधिकारी उदयादित्य और नरवर्मन की प्रशंसा की गई है। शास्त्रीय संस्कृत में एक नाटकीय रचना है। यह अर्जुनवर्मा देव [King Arjunavarman] (1299-10 से 1215-18 ईस्वी) के शासनकाल के दौरान अंकित किया गया था। यह नाटक प्रसिद्ध जैन विद्वान आषाधार के शिष्य और राजकीय शिक्षक मदन द्वारा रचा गया था। नाटक को कर्पुरमंजरी कहा जाता है और यह धार में वसंत उत्सव के लिए था। साल 1305, 1401 और 1514 ई. में मुस्लिम आक्रांताओं ने भोजशाला के इस मंदिर और शिक्षा केंद्र को बार-बार तबाह किया। 1305 ई. में क्रूर और बर्बर मुस्लिम अत्याचारी अलाउद्दीन खिलजी ने पहली बार भोजशाला को नष्ट किया। हालाँकि, इस्लामी आक्रमण की प्रक्रिया 36 साल पहले 1269 ई. में ही शुरू हो गई थी, जब कमाल मौलाना नाम का एक मुस्लिम फकीर मालवा पहुँचा।
कमाल मौलाना ने कई हिंदुओं को इस्लाम में धर्मांतरित करने के लिए छल-कपट का सहारा लिया। उसने 36 सालों तक मालवा क्षेत्र के बारे में विस्तृत जानकारी इकट्ठा की और उसे अलाउद्दीन खिलजी को दे दी। युद्ध में मालवा के राजा महाकाल देव के वीरगति प्राप्त करने के बाद खिलजी ने कहर शुरू हो गया। खिलजी के सैनिकों ने मंदिर की पवित्रता को नष्ट किया शिल्प कलाओं में बनी मूर्तियों को खंडित किया मां देवी की प्रतिमा को खंडित करके परिसर से बाहर फेंक दिया। खिलजी के बाद एक अन्य मुस्लिम आक्रमणकारी दिलावर खान ने 1401 ई. में यहाँ के विजय मंदिर (सूर्य मार्तंड मंदिर) को ध्वस्त कर दिया और सरस्वती मंदिर भोजशाला के एक हिस्से को दरगाह में बदलने का प्रयास किया। मुस्लिम आज उसी विजय मंदिर में नमाज अदा करते हैं। फिर 1514 ई. में महमूद शाह ने भोजशाला को घेर लिया और इसे एक दरगाह में बदलने का प्रयास किया। उन्होंने सरस्वती मंदिर के बाहर के क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और ‘कमाल मौलाना मकबरा’ की स्थापना की। इसी आधार पर भोजशाला को दरगाह होने का दावा किया जा रहा है।
1552 ई. में मेदनी राय नाम के एक क्षत्रिय राजा ने हिंदू सैनिकों को इकट्ठा महमूद खिलजी को मार भगाया। इस लड़ाई में मेदनी राय ने हजारों मुस्लिम सैनिकों को मारे और 900 मुस्लिम सैनिकों को गिरफ्तार कर धार किले में बंद कर दिया। 25 मार्च 1552 को धार किले में काम करने वाले सैयद मसूद अब्दाल समरकंदी ने विश्वासघात करते हुए उन सैनिकों को रिहा कर दिया। बाद में राजा मेदनी राय ने समरकंदी को विश्वासघात के लिए मृत्युदंड दिया। उसी सैयद मसूद अब्दाल समरकंदी को धार किले में ‘बंदीछोड़ दाता’ कहा जाता है। मुगल काल समाप्त होने के बाद 1875 में ब्रिटिश काल के दौरान ब्रिटिश मेजर किन केड यहां स्थापित वाग्देवी की मूर्ति को लेकर लंदन चले गए, जो आज भी लंदन के म्यूजियम में मौजूद है।
भारत की स्वतंत्रता के पश्चात जब देश की जनता को लगा कि अब हमारे मान बिंदुओं मठ मंदिरों पर गुलामी के काल में हुए अवैध अतिक्रमण, आक्रमण से हिंदू समाज को न्याय मिलेगा तब भी भोजशाला के प्रति सरकार व प्रशासन के किसी तंत्र ने कोई रुचि नहीं दिखाई। तब जाकर सन 1952 में महाराजा भोज स्मृति समिति का गठन करके भोजशाला मुक्ति का आंदोलन आरंभ हुआ, सन 1961 में विख्यात पुरातत्व वेत्ता व इतिहासकार पद्मश्री डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर द्वारा लंदन जाकर यह प्रमाणित किया गया कि लंदन के म्यूजियम में रखी वाग्देवी प्रतिमा ही भोजशाला में स्थापित थी। यह एक बहुत बड़ा प्रमाण भोजशाला देवी मां सरस्वती की विद्यमान मूर्ति से संबंधित है जिसे एक पुरातत्व विद द्वारा प्रमाणित किया गया था सर्व हिंदू समाज को ध्यान रहे की सन 1970 से पहले मुसलमान ने भोजशाला में कभी नमाज नहीं पड़ी, परंतु तत्कालीन तुष्टिकरण सरकार के चलते सन 1970 के बाद हठधर्मी मुसलमान भोजशाला के अंदर नमाज पढ़ने लगा। जबकि एएसआई द्वारा रक्षित क्षेत्र होने के कारण मुसलमान को यह अधिकार 1970 में ही नहीं दिया जाना चाहिए था, क्योंकि भोजशाला परिसर पूर्ण रूप से सनातन धर्म के मंदिर के रूप में प्रमाणित है इसके प्रमाण वहां का एक-एक स्तंभ एक-एक द्वार पर लगी पत्तिकाएं अंदर लिखा शिलालेख व स्तंभ के ऊपर बने बीम में विभिन्न प्रकार की हिंदू देवी देवताओं की रचना व सनातन धर्म में विदित नागयंत्र कलाकृति से स्पष्ट होता है कि भोजशाला एक हिन्दू मंदिर रही है।
सन 1992 जब भारत में राम जन्मभूमि आंदोलन चरम पर था तब भी महाराजा भोज स्मृति बसंत उत्सव समिति द्वारा बसंत पंचमी पर एक विशाल धर्म सभा का आयोजन हुआ जो भोजशाला मुक्ति आंदोलन से संबंधित था इस विशाल धर्म सभा को पूजनीय दीदी मां ऋतंभरा द्वारा संबोधित किया गया व उनके आवाहन के पश्चात सन 1992 से ही सत्याग्रह के रूप में मंगलवार हिंदू समाज सामूहिक रूप से सत्याग्रह में हनुमान चालीसा करने लगा। इसके पूर्व हिंदू समाज प्रत्येक मंगलवार दर्शन के लिए यथावत रूप से भोजशाला में जाता था। धार नगरी व मालवा के हिंदू समाज ने कभी भी भोजशाला को अपने स्मरण अपने मान बिंदुओं से भिन्न नहीं होने दिया, वरन प्रत्येक बसंत पंचमी को लाखों की संख्या में हिंदू समाज एकत्र होकर भोजशाला से इस्लामिक कब्जे को मुक्त करके वहाँ वाग्देवी मां सरस्वती की पुनर्स्थापना का संकल्प लेता है।
12 मार्च 1997 से पहले हिंदुओं को दर्शन करने की अनुमति थी, लेकिन वे पूजा नहीं कर सकते थे। इसकी अनुमति नहीं थी। साल 1997 में मध्य प्रदेश की तत्कालीन मुस्लिम तुष्टिकरण वालो कांग्रेस सरकार ने एक आदेश जारी कर मुस्लिमों को हर शुक्रवार को भोजशाला में नमाज अदा करने की दे दी और हिंदुओं को भोजशाला में प्रवेश पर रोक लगा दिया। हिंदुओं को केवल वसंत पंचमी के दौरान भोजशाला में प्रवेश करने और पूजा करने की अनुमति थी।
इसके पश्चात सन 2000 में हिंदू समाज ने बड़ी संख्या में धर्म जागरण कर धार नगरी व आसपास के सभी गांव में घर-घर जाकर भोजशाला मुक्ति आंदोलन को जन-जन का विषय बनाया इस आंदोलन के अंतर्गत घर-घर देवालयों की स्थापना की गई बड़ी संख्या में बसंत पंचमी पर हिंदू समाज एकत्र होकर बहुत शाला की मुक्ति का संकल्प दोहराता है इसी जागरण का परिणाम था कि सन 2003 में 9 लाख से भी अधिक लोगों ने बसंत पंचमी पर मां-बाप देवी का पूजन भोजशाला के अंदर किया। 6 फरवरी सन 2003 हिंदू स्वाभिमान का पुनर्जागरण हुआ और बहुत शाला मुक्ति के लिए एक लाख से अधिक धर्म रक्षों का संगम धार नगरी में होता है। भोजशाला को अप्रैल 2003 में हिंदुओं के लिए खोल दिया गया था। हिंदू भक्तों को मंदिर में हर दिन आ सकते थे, लेकिन सिर्फ मंगलवार को पूजा कर सकते थे, वो भी सिर्फ फूल, चावल से।
सन 2003 में बसंत पंचमी शुक्रवार को आती है हिंदू समाज बड़ी संख्या में पूरे दिन बहुत शाला में यज्ञ हवन पूजन के लिए संकल्प था अपने मन बिंदु भोजशाला के स्वाभिमान की रक्षा के लिए हिंदू समाज के तीन कार्यकर्ता बलिदान हो जाते हैं तथा 1400 से अधिक हिंदू कार्यकर्ताओं पर अनेक प्रकरण दर्ज किए जाते हैं इस कालखंड में हिंदू विरोधी सरकार होने के कारण हिंदू समाज को अनेक प्रकार से प्रताड़ित करने का षड्यंत्र किया जाता है परंतु फिर भी सारी प्रताड़नाओं को झेल कर भी हिंदू समाज ने भोजशाला मुक्ति आंदोलन में एक-एक पग आगे बढ़ते हुए अपना स्वाभिमान जागृत रखा। 8 अप्रैल सन 2003 में हिंदू समाज को 650 वर्षों के संघर्ष के बाद एक बड़ी विजय प्राप्त होती है जिसके अंतर्गत हिंदू समाज को भोजशाला में सशक्त दर्शन एवं पूजन का अधिकार मिलता है के अंतर्गत हिंदू प्रत्येक दिवस प्रातः काल से साइन कल तक भोजशाला में प्रवेश करके दर्शन कर सकता है परंतु शुक्रवार को हिंदू समाज का भोजशाला में प्रवेश वर्जित रहता है, सन 2006 में एक बार पुनः बसंत पंचमी शुक्रवार को आती है और पहली बार जिले के हिंदू शूरवीरों के द्वारा दिन भर गर्भ गृह में हवन पूजन आरंभ रहता है यह ध्यान में रखा जाए कि 2006 में भी शुक्रवार को बसंत पंचमी आई परंतु यज्ञ में समीधा पूरे समय जलती रही, व पूजन पूरे समय निर्बाध रूप से हिंदू समाज के वीरों द्वारा किया गया। संगठित हिंदू समाज के पराक्रम के कारण नमाज बहुत साल परिसर के बाहर संपन्न हुई।
सन 2013 में भी हिंदू समाज के पराक्रम के कारण नमाज भोजशाला परिसर से बाहर होती है सन 2016 में हम सभी के प्रयत्न के चलते सत्याग्रह के कारण समाज जागरण के कारण पुनः एक सफलता प्राप्त होती है सन 2016 में हिंदू समाज ने बगैर पुलिस के डंडे खाए अपनी बात मनवा, हर बार पूजा हवन अंदर होता रहता था और आंदोलन हिंदू समाज बाहर करता था, जिससे पूजा खंडित होती थी। सन 2016 में सूर्योदय के साथ ही गर्भ गृह में माता के तेल चित्र का पूजन कर स्थापित कर ज्योत प्रज्वलित की और बाहर सत्याग्रह स्थल पर सूर्योदय के साथ ही मां सरस्वती यज्ञ प्रारंभ किया। दोनों ही स्थान पर पूजन संध्या आरती तक अनवरत चलता रहा। यहां का मुस्लिम भी जानता है कि यहां नमाज नहीं हुई है, इससे पूर्व बसंत पंचमी शुक्रवार जब-जब साथ आते थे तब शासन प्रशासन द्वारा लाठी चार्ज कर हिंदू समाज को बाहर खदेड दिया जाता था, इतिहास में सन 2016 में पहली बार हिंदू समाज की शर्तों पर सरस्वती जन्मोत्सव हुआ, सतत चल रहे सत्याग्रह के फल स्वरुप जहां हमें वर्ष में एक दिन के पूजन का अधिकार प्राप्त था वही आज हम वर्ष में 52 दिन पूजन कर रहे हैं जहां हमारे प्रवेश पर ही प्रतिबंध था। वहीं प्रति मंगलवार मां वाग्देवी के तेल चित्र शंख घंटा घड़ियाल पांच आरती के साथ पूजा एवं प्रसादी वितरण साथ ही 27 वर्षों से चल रहे हैं अखंड सत्याग्रह के कारण जिले भर में हिंदू शक्ति संगठित हुई इसके परिणाम स्वरुप हिंदू समाज का स्वाभिमान बड़ा है 650 वर्षों से चल रहा है सत्याग्रह की पूर्णाहुति तब होगी जब लंदन से वाग्देवी मां सरस्वती की मूर्ति को मुक्त करके उन्हें धार के सरस्वती मंदिर भोजशाला में पुनः स्वाभिमान से विराजित किया जाएगा। अतः भारत के हर हिन्दू को मध्यप्रदेश कि अयोध्या भोजशाला के दर्शन स्वयं करना चाहिए और निश्चित करना चाहिए कि स्वतंत्र भारत में भी हिन्दू समाज अपने मठ मंदिरो कि रक्षा व पुनः अधिकार प्राप्ति के लिए कब तक संघर्ष करेगा ? वह दिन दूर नहीं जब संवेधानिक तरिके से ही हिन्दू समाज विजयी होकर भोजशाला में माँ वाग्देवी को लंदन के संग्रहालय से वापस लाकर स्वाभिमान से स्थापित करेगा। अयोध्या, काशी, मथुरा के साथ भोजशाला में भी हिन्दू समाज गर्व से भजन पूजन अपनी इच्छा अनुसार कर सकेगा।
— मंगलेश सोनी
