कविता

नवसंवत्सर का अभिनन्दन

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की शुभ तिथि, भारतीय नववर्ष है लायी।
हुआ प्रफुल्लित जन – जन का उर, चहुँदिश स्वर्णिम आभा छायी।

विक्रमी संवत बदल गया है, ‘दो हजार तिरासी ‘है आया।
खिल उठी प्रकृति, धरती पुलकित, वातावरण रुचिर मुस्काया।

कैलेण्डर एक जनवरी का, बस वार, दिनांक बताता है।
पंचांग में अंकित व्रत – मुहूर्त, त्यौहार – पर्व का नाता है।

ओजस प्रकाश से आलोकित, नवसंवत्सर का अभिनन्दन।
ब्रह्मा ने सृष्टि – सर्जना की, पुष्पित – पल्लवित विश्व – नन्दन।

मानवता की सेवा में ही, श्वासों का अर्पित हो क्षण – क्षण ।
साधना-परिश्रम-अमृत से, अभिसिंचित हो जीवन – कण – कण ।

प्रार्थना है राष्ट्र देवता से,अति गौरवशाली हो भविष्य।
भारत माँ पुनर्प्रतिष्ठित हो, चरणों में अर्पित हो हविष्य।

घर – घर भगवा ध्वज फहराए, वंदनवारों से सजें द्वार।
स्वस्तिकमय रचें रंगोली को, बाँटें निर्धन को फलाहार।

नववर्ष के मंगल स्वागत में,मिलजुल झूमें, नाचें – गाएँ।
शुभकामना – बधाई दें सबको, पूर्ण हों लक्ष्य – अभिलाषाएँ।

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

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