किताब
आज भी याद है वह किताब,
खोलूँ तो महके जनाब,
उड़ते हैं पन्नों से अलसाए ख़्वाब,
भीग उठे मन का शबाब।
बीच पन्नों में सूखा गुलाब,
दबा हुआ कोई अनकहा जवाब,
हल्की सी खुशबू, हल्का सा हिसाब,
और धड़कनें बेहिसाब।
कहीं शार्पनर से छिली पेंसिल की कुरचन,
कोनों में अटकी बचपन की धड़कन,
स्याही के धब्बे, आधी सी रचना,
जैसे समय की कोई अटकी कम्पन।
कभी नाम लिखा था चुपके से,
कभी आँसू गिरे थे पन्नों पे,
कभी हँसी छिपी थी लफ़्ज़ों में
सब दर्ज है उस किताब में।
कैसे भूलें वह किताब,
जिसमें उम्र का हर पड़ाव,
कुछ यादें थीं बेहद ख़ास,
और कुछ सपने… बेहिसाब।
— सविता सिंह मीरा
