ग़ज़ल
मेरे आंसू तेरी आंखों से अगर मिल जाएं
जितने मुरझाए हुए फूल हैं सब खिल जाएं!!
सांस लेना मुझे आसान भी हो सकता है
टहनियां पेड़ की धीरे से अगर हिल जाएं!!
एक एक कर के सभी बस्तियां वीरान हुईं
क़त्ल करने के लिए अब कहां क़ातिल जाएं!!
ढूंढती रहती हैं हर वक्त यह आंखें उस को
किसी बाज़ार से गुज़रें किसी महफ़िल जाएं!!
ख़ामोशी इतनी भी अच्छी नहीं होती जान,
मुझ को डर है कहीं होठ तेरे न सिल जाएं!
— हेमंत सिंह कुशवाह
