सामाजिक

बच्चों की परवरिश

बच्चों की परवरिश इंसान की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है, लेकिन अक्सर हम ग़लत रास्ते चुन लेते हैं। फ़ौरन रद्देअमल यानी तुरंत चिल्लाना या सज़ा देना एक स्वाभाविक इंसानी फ़ितरत हो सकती है,जब बच्चा कुछ ग़लत करता है, तो ग़ुस्सा आना लाज़मी लगता है। लेकिन एक समझदार वालिदैन (माता-पिता) वही हैं जो अपने ग़ुस्से पर क़ाबू पाते हैं। वे ठंडे दिमाग़ से सोचते हैं और मसले का ऐसा हल निकालते हैं जो बच्चे के भविष्य को संवारे, न कि तोड़े।याद रखें, डांट और मार से बच्चा सिर्फ़ “डरना” सीखता है। आपके सामने तो वह डर के मारे ग़लती छोड़ देगा, लेकिन पीठ पीछे उसे दोहराएगा।क्योंकि डर से सीखा हुआ सबक़ कभी स्थायी नहीं होता। सच्ची तरबियत वह है जहाँ बच्चा आपकी ग़ैर-मौजूदगी में भी सही और ग़लत की तमीज़ रखे। वह खुद से फ़ैसला ले सके, न कि सिर्फ़ डर से रुके। मिसाल के तौर पर, अगर बच्चा खिलौना तोड़ दे, तो मारने की बजाय पूछें, “यह टूट गया, अब हम इसे कैसे ठीक करेंगे?” इससे वह ज़िम्मेदारी सीखेगा।नज़रों का राब्ताकायम करें,आंखों में देखकर बोलें ,नज़रों का राब्ता बहुत गहरी बात है। “आंखों में देखकर कहें” क्योंकि ये तरीका यह जादू की तरह काम करता है। जब आप बच्चे के क़द के बराबर झुकेंगे, उसकी आंखों में मोहब्बत और संजीदगी से देखेंगे, तो आपकी बात सीधे उसके दिल तक पहुँच जाती है। बच्चे की आँखें उसके दिल का आईना होती हैं, वहाँ डर नहीं, बल्कि समझ और प्यार पहुँचेगा।उदाहरण लीजिए,मान लीजिए बच्चा झूठ बोल रहा है। ऊँची आवाज़ में चिल्लाने की बजाय, घुटनों के बल बैठें, उसकी आँखों में देखें और कहें, “बेटा, मुझे सच बताओ, हम साथ मिलकर इसे सुलझाएँगे।” यह तरीक़ा बच्चे को सुरक्षित महसूस कराता है, और वह खुलकर बोलता है। वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध है कि आई कॉन्टेक्ट से बच्चे का दिमाग़ ऑक्सीटोसिन हार्मोन रिलीज़ करता है, जो भरोसा बढ़ाता है।एहसास-ए-जुर्म न कराएँ, सुधार पर ज़ोर दें,बच्चों को कभी यह महसूस न कराएँ कि वे “बुरे” हैं। बच्चे एहसास-ए-जुर्म (गिल्ट) से सुधरते नहीं, बल्कि टूट जाते हैं। इसके बजाय, उन्हें यह समझाएँ कि उनका किया गया काम या हरकत अच्छी नहीं थी। कहें कि “मुझे अच्छा नहीं लगा जब तुमने यह किया।” इससे बच्चे की इज़्ज़त-ए-नफ़्स (सेल्फ रेस्पेक्ट) को ठेस नहीं पहुँचती, और वह ग़लती को अलग करके खुद को अलग नहीं समझता। ये व्यावहारिक उदाहरण है,अगर बच्चा भाई-बहन से झगड़ा करे, तो  उससे ऐसा न कहें “तुम बुरे हो!”, बल्कि कहें “झगड़ा करना अच्छा नहीं लगता, क्या हम शांति से बात करें?” इससे बच्चा सोचता है, सुधारता है अपने आपको, और अगली बार खुद सँभाल लेता है। मनोविज्ञान कहता है कि सेल्फ-एस्टिम बरक़रार रखने से बच्चे आत्मविश्वासी बनते हैं।जज़्बाती ताल्लुक़ तरबियत का बुनियादी उसूल होता है,तरबियत का आधार “ताल्लुक़” है,यानी मज़बूत इमोशनल कनेक्शन। अगर बच्चे के साथ आपका रिश्ता दोस्ती और भरोसे का है, तो सुधारने के लिए ऊँची आवाज़ की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। वह आपकी महज़ एक उदास नज़र देखकर संभल जाएगा। बच्चा सोचेगा, “मम्मी-पापा दुखी हैं, मैंने ग़लत किया।”सुनने की आदत डालें। तरबियत सिर्फ़ बोलने का नाम नहीं, बल्कि बच्चे को सुनने का नाम भी है। जब बच्चा महसूस करता है कि उसके जज़्बात को समझा जा रहा है, तो वह आपकी सलाह को हुक्म नहीं, बल्कि हिदायत मानता है। रोज़ाना 10-15 मिनट बच्चे से उसकी बातें सुनें,स्कूल की, दोस्तों की, सपनों की। इससे भरोसा गहरा होता है। मिसाल के तौर पर बच्चा रो रहा हो, तो पहले गले लगाएँ, सुनें, फिर सलाह दें। यह तरीक़ा लंबे समय तक असरदार रहता है।अंत में, परवरिश धैर्य और प्यार की कला है। इन छोटे-छोटे उसूलों को अपनाएँ, तो आपके बच्चे न सिर्फ़ आज, बल्कि कल भी सही रास्ते पर चलेंगे।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।