गीत
धुंध के रेशमी जाल में फँस गया
आज फिर धूप का एक टुकड़ा यहाँ
अधखिला रह गया है पलाश शाख पर
जैसे आधा ढका हो कोई मुखड़ा यहाँ
दृष्टि में बस गया वो जो दिखता नहीं
निराकार की गूँज अब दिशाएँ हुईं
प्राण के मौन एकांत की अब सभी
सिसकियाँ ही हृदय की दुआएँ हुईं
पत्थरों की कड़ी पीठ पर जो उगी
मौन काई की वह सघन सांत्वना
सूख कर जो नदी मौन सी हो गई
बन गई है वही अब प्रखर प्रार्थना
पिघलने लगा जड़ सा अस्तित्व भी
तप्त साँसें मधुर सी हवाएँ हुईं
पीर की आंच में तप कर जो ढलीं
सिसकियाँ ही हृदय की दुआएँ हुईं
तप रही रेत की परतों के नीचे भी
तृप्ति की एक लहर करवट में है
जो समर्पण यहाँ दृष्टि आता नहीं
वो हृदय की पुरानी सी आहट में है
झुक गई हैं अब ये लंबी परछाइयाँ
विरह की धूप ही अब घटाएँ हुईं
प्यास जब मिल गई प्रभु के चरणों में
सिसकियाँ ही हृदय की दुआएँ हुईं
रिक्त नीड़ों के भीतर जो सन्नाटा है
वो परिंदों की चहक का विस्तार है
मिट चुका जो यहाँ वो ही सच हो गया
शून्यता में ही छिपा अब सारा सार है
आरती बन गई रंज की वेदना
अश्रु की बूंद ही अब सभाएँ हुईं
अंश जब मिल गया पूर्ण के सिंधु में
सिसकियाँ ही हृदय की दुआएँ हुईं
— भानु शर्मा रंज
