राजनीति

अगले साल मार्च में पता चलेगा यूपी में ‘हम कितने हैं’

उत्तर प्रदेश की जनसंख्या में 2011 की जनगणना के बाद कितनी वृद्धि हुई है, इसका सटीक आंकड़ा जानने के लिए 16वीं जनगणना 22 मई 2026 से शुरू हो रही है। यह प्रक्रिया दो चरणों में पूरी की जाएगी। पहले चरण में मकानों की संख्या, उनकी स्थिति और उपलब्ध सुविधाओं का डेटा एकत्र किया जाएगा, जबकि दूसरे चरण में वास्तविक जनसंख्या की गणना होगी। लाखों कर्मियों को इस कार्य के लिए तैनात किया गया है और पूरी प्रक्रिया डिजिटल तरीके से संचालित होगी। अंतिम आंकड़े 1 मार्च 2027 को घोषित हो जाएंगे। यह जनगणना न केवल आबादी का सही आंकड़ा देगी, बल्कि राज्य की विकास योजनाओं, संसाधनों के वितरण और नीतियों को आकार देने में भी मदद करेगी। ऐसा लग रहा है कि जनगणना के आंकड़े आने के आसपास ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के भी नतीजे आएंगे, क्योंकि मोदी का कार्यकाल अगले साल मार्च में पूरा हो रहा है।खैर, उत्तर प्रदेश भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है, जहां 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 19.98 करोड़ लोग रहते थे। उसके बाद 15 वर्षों में आबादी में तेजी से वृद्धि हुई है। अनुमानों के अनुसार, वर्तमान आबादी 24 करोड़ से अधिक हो चुकी है, लेकिन सटीक संख्या जानने के लिए ही यह नई जनगणना आवश्यक है। राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने इसकी तैयारियां लंबे समय से की हैं। महामारी और अन्य चुनौतियों के बावजूद प्रक्रिया को समय पर शुरू करने का निर्णय सराहनीय है। पहले चरण में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के घरों का सर्वे होगा, जिसमें बिजली, पानी, शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं की जानकारी ली जाएगी। इससे राज्य के विकास के स्तर का पता चलेगा और कमजोर क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा।

दूसरे चरण में जनसंख्या गणना के दौरान प्रत्येक व्यक्ति का नाम, उम्र, लिंग, शिक्षा, रोजगार और प्रवास जैसे विवरण दर्ज किए जाएंगे। डिजिटल माध्यम से यह कार्य तेज और त्रुटिरहित होगा। कर्मियों को हैंडहेल्ड डिवाइस दिए जाएंगे, जिनमें जीपीएस की मदद से स्थान का पता चलेगा। इससे डुप्लिकेट एंट्री या गलतियां कम होंगी। लाखों कर्मचारियों की तैनाती से ग्रामीण इलाकों तक पहुंच सुनिश्चित होगी। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में यह चुनौतीपूर्ण है, जहां पूर्वांचल, बुंदेलखंड और अवध क्षेत्रों में अलग-अलग जनघनत्व है। जनगणना के आंकड़े संसद सीटों के पुनर्वितरण, विधानसभा क्षेत्रों के सीमांकन और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान में उपयोगी साबित होंगे।इस जनगणना का महत्व कई स्तरों पर समझा जा सकता है। सबसे पहले, 2011 के बाद जन्म दर, मृत्यु दर और प्रवास पैटर्न में बदलाव आया है। युवा आबादी बढ़ी है, लेकिन बेरोजगारी और शिक्षा के स्तर पर सवाल उठे हैं। जनगणना से पता चलेगा कि कितने बच्चे स्कूल जा रहे हैं, महिलाओं की भागीदारी कितनी है और बुजुर्गों की संख्या क्या है। दूसरा, कोविड महामारी ने स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी उजागर की, अब आंकड़ों से अस्पतालों और डॉक्टरों की आवश्यकता का आकलन होगा। तीसरा, जलवायु परिवर्तन और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में आबादी का घनत्व जानना जरूरी है। उदाहरण के लिए, गंगा-यमुना के मैदानी इलाकों में आबादी अधिक है, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में कम। इन आंकड़ों से सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और आवास योजनाएं बेहतर होंगी।

राज्य सरकार ने इसकी तैयारियों में कोई कसर नहीं छोड़ी। प्रशिक्षण शिविर लगाए गए, सॉफ्टवेयर विकसित किए गए और जागरूकता अभियान चलाए गए। ग्रामीणों को बताया गया कि सर्वे में कोई व्यक्तिगत खतरा नहीं है और जानकारी गोपनीय रहेगी। डिजिटल प्रक्रिया से पारदर्शिता बढ़ेगी, क्योंकि डेटा रीयल टाइम में अपलोड होगा। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर एक समन्वय समिति बनाई है, जिसमें सभी राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हैं। उत्तर प्रदेश को सर्वाधिक ध्यान मिलेगा, क्योंकि यहां की आबादी पूरे देश की लगभग 17 प्रतिशत है। 1 मार्च 2027 तक अंतिम आंकड़े आने पर नीति-निर्माताओं को नई दिशा मिलेगी।जनगणना के सामाजिक प्रभाव भी गहरे होंगे। पिछली गणना में अनुसूचित जाति-जनजाति की आबादी का सटीक आंकड़ा मिला था, जिससे आरक्षण नीतियां मजबूत हुईं। अब भी अल्पसंख्यक समुदायों, प्रवासी मजदूरों और शहरी झुग्गीवासियों पर फोकस होगा। महिलाओं की साक्षरता दर में सुधार हुआ है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी कमी है। आंकड़ों से बाल विवाह, कुपोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति स्पष्ट होगी। इसके अलावा, आर्थिक विश्लेषण के लिए रोजगार के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। उत्तर प्रदेश में कृषि पर निर्भरता अधिक है, लेकिन उद्योग और सेवा क्षेत्र बढ़ रहे हैं। जनगणना बताएगी कि कितने लोग खेती छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

राजनीतिक दृष्टि से यह जनगणना दिलचस्प होगी। आबादी के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटें पुनर्गठित होंगी। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटें प्रभावित हो सकती हैं। क्षेत्रीय असंतुलन दूर करने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल में विकास पर जोर बढ़ेगा। विपक्षी दल भी आंकड़ों का उपयोग अपनी मांगों के लिए करेंगे। सरकार को सतर्क रहना होगा कि प्रक्रिया निष्पक्ष रहे। पिछली जनगणनाओं में कुछ क्षेत्रों में विवाद हुए थे, लेकिन डिजिटल सिस्टम से यह समस्या कम होगी। चुनौतियां भी कम नहीं हैं। गर्मी के मौसम में सर्वे करना कठिन होगा, इसलिए कर्मियों को विशेष सुविधाएं दी जा रही हैं। कुछ इलाकों में सुरक्षा की समस्या है, वहां पुलिस सहायता ली जाएगी। डिजिटल साक्षरता की कमी से ग्रामीणों को समझाना पड़ेगा। फिर भी, सरकार का दावा है कि 100 प्रतिशत कवरेज सुनिश्चित होगा। वैज्ञानिक तरीके से सैंपल सर्वे भी किए जाएंगे, ताकि अनुमान सटीक रहें। यह जनगणना उत्तर प्रदेश के भविष्य को आकार देगी। 2011 के बाद आबादी में अनुमानित 4 करोड़ की वृद्धि हुई है, लेकिन सटीक संख्या से योजनाएं प्रभावी होंगी। प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत और मनरेगा जैसे कार्यक्रमों के लाभार्थी तय होंगे। शिक्षा के लिए स्कूल, स्वास्थ्य के लिए अस्पताल बनेंगे। युवाओं के लिए कौशल विकास पर फोकस बढ़ेगा। कुल मिलाकर, यह प्रक्रिया राज्य को मजबूत बनाएगी। 22 मई से शुरू हो रही इस जनगणना में सभी नागरिकों का सहयोग अपेक्षित है। सटीक जानकारी देने से देश का विकास तेज होगा। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में आबादी प्रबंधन चुनौती है, लेकिन अवसर भी। अंतिम आंकड़े 1 मार्च 2027 को आने पर नई शुरुआत होगी। यह न केवल संख्या गिनती है, बल्कि लोगों की जरूरतों को समझने का माध्यम है। राज्य सरकार की यह पहल स्वागतयोग्य है।

अजय कुमार

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